फ़ैसल अजमी

ग़ज़ल 17

शेर 20

आवाज़ दे रहा था कोई मुझ को ख़्वाब में

लेकिन ख़बर नहीं कि बुलाया कहाँ गया

मैं ज़ख़्म खा के गिरा था कि थाम उस ने लिया

मुआफ़ कर के मुझे इंतिक़ाम उस ने लिया

अब वो तितली है वो उम्र तआ'क़ुब वाली

मैं कहता था बहुत दूर जाना मिरे दोस्त

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हर्फ़ अपने ही मआनी की तरह होता है

प्यास का ज़ाइक़ा पानी की तरह होता है

उस को जाने दे अगर जाता है

ज़हर कम हो तो उतर जाता है