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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

रद करें डाउनलोड शेर

दश्त पर शेर

आप सागर हैं तो सैराब करें प्यासे को

आप बादल हैं तो मुझ दश्त पे साया कीजे

अब्दुर्रहीम नश्तर

ये मेरे दिल की हवस दश्त-ए-बे-कराँ जैसी

वो तेरी आँख के तेवर समुंदरों वाले

मोहसिन नक़वी

गुज़र कर दश्त से 'सालिम' जुनूँ के

सफ़र की आबरू हो जाऊँगा मैं

फ़रहान सालिम

दश्त फिर क्यों नहीं रहे आबाद

अब्र आज़ाद है हवा महफ़ूज़

याह्या ख़ान यूसुफ़ ज़ई

वुस'अत-ए-सहरा के आगे आसमाँ छोटा लगा

धूप ऐसी थी कि सर को साएबाँ छोटा लगा

फ़रियाद आज़र

दश्त दरपेश है सो चलता हूँ

आँख में भर के तीन चार दरख़्त

इकराम आरफ़ी

यक-क़लम काग़ज़-ए-आतिश-ज़दा है सफ़्हा-ए-दश्त

नक़्श-ए-पा में है तब-ए-गर्मी-ए-रफ़्तार हुनूज़

Interpretation: Rekhta AI

ग़ालिब ने रेगिस्तान को “पन्ना” और चलने की तीव्रता को आग की तरह दिखाया है, जो गुजरते ही सब कुछ जला देती है। जला हुआ कागज़ उजाड़पन और कठिन अनुभव का संकेत बनता है। लेकिन पैरों के निशानों में बची गर्मी बताती है कि उस जुनून की छाप अब भी बाकी है। यानी वीरानी के भीतर भी बेचैनी की तपिश कायम रहती है।

मिर्ज़ा ग़ालिब

सवाल ये है कि दश्त-ए-बदन का क्या होगा

अगर जुनूँ का परिंदा क़फ़स में आया नईं

आक़िब साबिर
बोलिए