किस शायरी

बोसा यानी चुंबन को उर्दू शाइरी की हर परंपरा में ख़ास अहमियत हासिल है । इश्क़-ओ-आशिक़ी के मामलात में ही इस के कई रंग नज़र आते हैं । उर्दू शाइरी में बोसे की तलब की कैफ़ियतों से ले कर माशूक़ के इनकार की सूरतों तक का बयान काफ़ी दिलचस्प है । यहाँ शोख़ी है, हास्य है, हसरत है और ग़ुस्से की मिली-जुली कैफ़ियतें हैं । प्रसुतुत शाइरी से आप को उर्दू शाइरी के कुछ ख़ास रंगों का अंदाज़ा होगा ।

बे-ख़ुदी में ले लिया बोसा ख़ता कीजे मुआफ़

ये दिल-ए-बेताब की सारी ख़ता थी मैं था

बहादुर शाह ज़फ़र

धमका के बोसे लूँगा रुख़-ए-रश्क-ए-माह का

चंदा वसूल होता है साहब दबाव से

अकबर इलाहाबादी

एक बोसे के तलबगार हैं हम

और माँगें तो गुनहगार हैं हम

A kiss is all that I aspire for

I would be guilty if I ask for more

अज्ञात

मिल गए थे एक बार उस के जो मेरे लब से लब

उम्र भर होंटों पे अपने मैं ज़बाँ फेरा किए

जुरअत क़लंदर बख़्श

एक बोसा होंट पर फैला तबस्सुम बन गया

जो हरारत थी मिरी उस के बदन में गई

काविश बद्री

बोसा जो रुख़ का देते नहीं लब का दीजिए

ये है मसल कि फूल नहीं पंखुड़ी सही

शेख़ इब्राहीम ज़ौक़

बोसा देते नहीं और दिल पे है हर लहज़ा निगाह

जी में कहते हैं कि मुफ़्त आए तो माल अच्छा है

मिर्ज़ा ग़ालिब

बोसे अपने आरिज़-ए-गुलफ़ाम के

ला मुझे दे दे तिरे किस काम के

मुज़्तर ख़ैराबादी

बोसा लिया जो उस लब-ए-शीरीं का मर गए

दी जान हम ने चश्मा-ए-आब-ए-हयात पर

अमीर मीनाई

दिखा के जुम्बिश-ए-लब ही तमाम कर हम को

दे जो बोसा तो मुँह से कहीं जवाब तो दे

with just the sight of moving lips, kill me, let me die

if you don't kiss me with your lips, do at least reply

मिर्ज़ा ग़ालिब

बोसा-ए-रुख़्सार पर तकरार रहने दीजिए

लीजिए या दीजिए इंकार रहने दीजिए

हफ़ीज़ जौनपुरी

मोहब्बत एक पाकीज़ा अमल है इस लिए शायद

सिमट कर शर्म सारी एक बोसे में चली आई

मुनव्वर राना

आता है जी में साक़ी-ए-मह-वश पे बार बार

लब चूम लूँ तिरा लब-ए-पैमाना छोड़ कर

जलील मानिकपूरी

बे-गिनती बोसे लेंगे रुख़-ए-दिल-पसंद के

आशिक़ तिरे पढ़े नहीं इल्म-ए-हिसाब को

we shall kiss your beautiful face without counting

your lover is unversed in the science of accounting

हैदर अली आतिश

लजा कर शर्म खा कर मुस्कुरा कर

दिया बोसा मगर मुँह को बना कर

अज्ञात

बोसा जो तलब मैं ने किया हँस के वो बोले

ये हुस्न की दौलत है लुटाई नहीं जाती

अज्ञात

बदन का सारा लहू खिंच के गया रुख़ पर

वो एक बोसा हमें दे के सुर्ख़-रू है बहुत

ज़फ़र इक़बाल

क्या क़यामत है कि आरिज़ उन के नीले पड़ गए

हम ने तो बोसा लिया था ख़्वाब में तस्वीर का

अज्ञात

बोसे बीवी के हँसी बच्चों की आँखें माँ की

क़ैद-ख़ाने में गिरफ़्तार समझिए हम को

फ़ुज़ैल जाफ़री

क्या ख़ूब तुम ने ग़ैर को बोसा नहीं दिया

बस चुप रहो हमारे भी मुँह में ज़बान है

मिर्ज़ा ग़ालिब

जिस लब के ग़ैर बोसे लें उस लब से 'शेफ़्ता'

कम्बख़्त गालियाँ भी नहीं मेरे वास्ते

those lips that others get to kiss alas on them I see

not even curses or abuse are now assigned for me

मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता

ले लो बोसा अपना वापस किस लिए तकरार की

क्या कोई जागीर हम ने छीन ली सरकार की

अकबर मेरठी

बोसा होंटों का मिल गया किस को

दिल में कुछ आज दर्द मीठा है

मुनीर शिकोहाबादी

उस लब से मिल ही जाएगा बोसा कभी तो हाँ

शौक़-ए-फ़ुज़ूल जुरअत-ए-रिंदाना चाहिए

मिर्ज़ा ग़ालिब

क्या ताब क्या मजाल हमारी कि बोसा लें

लब को तुम्हारे लब से मिला कर कहे बग़ैर

बहादुर शाह ज़फ़र

दिल-लगी में हसरत-ए-दिल कुछ निकल जाती तो है

बोसे ले लेते हैं हम दो-चार हँसते बोलते

मुंशी अमीरुल्लाह तस्लीम

हो बरहम जो बोसा बे-इजाज़त ले लिया मैं ने

चलो जाने दो बेताबी में ऐसा हो ही जाता है

जलाल लखनवी

बोसा तो उस लब-ए-शीरीं से कहाँ मिलता है

गालियाँ भी मिलीं हम को तो मिलीं थोड़ी सी

निज़ाम रामपुरी

हम को गाली के लिए भी लब हिला सकते नहीं

ग़ैर को बोसा दिया तो मुँह से दिखला कर दिया

आदिल मंसूरी

लब-ए-नाज़ुक के बोसे लूँ तो मिस्सी मुँह बनाती है

कफ़-ए-पा को अगर चूमूँ तो मेहंदी रंग लाती है

आसी ग़ाज़ीपुरी

बोसा आँखों का जो माँगा तो वो हँस कर बोले

देख लो दूर से खाने के ये बादाम नहीं

अमानत लखनवी

बुझे लबों पे है बोसों की राख बिखरी हुई

मैं इस बहार में ये राख भी उड़ा दूँगा

साक़ी फ़ारुक़ी

मैं रहा हूँ अभी चूम कर बदन उस का

सुना था आग पे बोसा रक़म नहीं होता

शनावर इस्हाक़

लब-ए-ख़याल से उस लब का जो लिया बोसा

तो मुँह ही मुँह में अजब तरह का मज़ा आया

जुरअत क़लंदर बख़्श

रुख़्सार पर है रंग-ए-हया का फ़रोग़ आज

बोसे का नाम मैं ने लिया वो निखर गए

हकीम मोहम्मद अजमल ख़ाँ शैदा

बोसा कैसा यही ग़नीमत है

कि समझे वो लज़्ज़त-ए-दुश्नाम

मिर्ज़ा ग़ालिब

सादगी देख कि बोसे की तमअ रखता हूँ

जिन लबों से कि मयस्सर नहीं दुश्नाम मुझे

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

जो उन को लिपटा के गाल चूमा हया से आने लगा पसीना

हुई है बोसों की गर्म भट्टी खिंचे क्यूँकर शराब-ए-आरिज़

अहमद हुसैन माइल

बोसाँ लबाँ सीं देने कहा कह के फिर गया

प्याला भरा शराब का अफ़्सोस गिर गया

आबरू शाह मुबारक

जी उठूँ फिर कर अगर तू एक बोसा दे मुझे

चूसना लब का तिरे है मुझ को जूँ आब-ए-हयात

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

सभी इनआम नित पाते हैं शीरीं-दहन तुझ से

कभू तू एक बोसे से हमारा मुँह भी मीठा कर

जुरअत क़लंदर बख़्श

हम तो क्यूँकर कहें कि बोसा दो

गर इनायत करो इनायत है

हकीम देहलवी

लुटाते हैं वो दौलत हुस्न की बावर नहीं आता

हमें तो एक बोसा भी बड़ी मुश्किल से मिलता है

जलील मानिकपूरी

बोसे में होंट उल्टा आशिक़ का काट खाया

तेरा दहन मज़े सीं पुर है पे है कटोरा

आबरू शाह मुबारक

नमकीं गोया कबाब हैं फीके शराब के

बोसा है तुझ लबाँ का मज़े-दार चटपटा

आबरू शाह मुबारक

जी में है इतने बोसे लीजे कि आज

महर उस के वहाँ से उठ जावे

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

रखे है लज़्ज़त-ए-बोसा से मुझ को गर महरूम

तो अपने तू भी होंटों तलक ज़बाँ पहुँचा

जुरअत क़लंदर बख़्श

बोले वो बोसा-हा-ए-पैहम पर

अरे कम-बख़्त कुछ हिसाब भी है

हसन बरेलवी

उस वक़्त दिल पे क्यूँके कहूँ क्या गुज़र गया

बोसा लेते लिया तो सही लेक मर गया

आबरू शाह मुबारक

एक बोसा माँगता है तुम से 'हातिम' सा गदा

जानियो राह-ए-ख़ुदा में ये भी इक ख़ैरात की

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम