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बहादुर शाह ज़फ़र

1775 - 1862 | दिल्ली, भारत

आख़िरी मुग़ल बादशाह। ग़ालिब और ज़ौक़ के समकालीन

आख़िरी मुग़ल बादशाह। ग़ालिब और ज़ौक़ के समकालीन

ग़ज़ल 51

शेर 62

तुम ने किया याद कभी भूल कर हमें

हम ने तुम्हारी याद में सब कुछ भुला दिया

you did not ever think of me even by mistake

and in your thoughts everything else I did forsake

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कोई क्यूँ किसी का लुभाए दिल कोई क्या किसी से लगाए दिल

वो जो बेचते थे दवा-ए-दिल वो दुकान अपनी बढ़ा गए

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कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें

इतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दाग़-दार में

tell all my desires to go find another place

in this scarred heart alas there isn't enough space

पुस्तकें 62

Bahadur Shah Zafar

 

2012

Bahadur Shah Zafar

Fun-o-Shakhsiyat

1965

Bahadur Shah Zafar

 

1965

Bahadur Shah Zafar

 

1986

Bahadur Shah Zafar Aur 1857

Tareekhi Drama

2011

Bahadur Shah Zafar Aur Unka Ahd

 

 

Bahadur Shah Zafar Ka Afsana-e-Gham

 

1989

बयाज़-ए-ज़फ़र

 

1994

Bazm-e-Firdaus Mein Yaum-e-Hazrat Bahadur Shah Zafar

Ak Tamsili Jannati Mushaera

1965

दीवान-ए-ज़फ़र

खण्ड-001और खण्ड.002

 

चित्र शायरी 15

कोई क्यूँ किसी का लुभाए दिल कोई क्या किसी से लगाए दिल वो जो बेचते थे दवा-ए-दिल वो दुकान अपनी बढ़ा गए

तुम ने किया न याद कभी भूल कर हमें हम ने तुम्हारी याद में सब कुछ भुला दिया

हाल-ए-दिल क्यूँ कर करें अपना बयाँ अच्छी तरह रू-ब-रू उन के नहीं चलती ज़बाँ अच्छी तरह

तुम ने किया न याद कभी भूल कर हमें हम ने तुम्हारी याद में सब कुछ भुला दिया

कोई क्यूँ किसी का लुभाए दिल कोई क्या किसी से लगाए दिल वो जो बेचते थे दवा-ए-दिल वो दुकान अपनी बढ़ा गए

वीडियो 17

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हबीब वली मोहम्मद

ऑडियो 23

करेंगे क़स्द हम जिस दम तुम्हारे घर में आवेंगे

ख़्वाह कर इंसाफ़ ज़ालिम ख़्वाह कर बेदाद तू

गालियाँ तनख़्वाह ठहरी है अगर बट जाएगी

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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