लगता नहीं है दिल मिरा उजड़े दयार में

बहादुर शाह ज़फ़र

लगता नहीं है दिल मिरा उजड़े दयार में

बहादुर शाह ज़फ़र

MORE BY बहादुर शाह ज़फ़र

    INTERESTING FACT

    फिल्म: लाल क़िला 1960

    लगता नहीं है दिल मिरा उजड़े दयार में

    किस की बनी है आलम-ए-ना-पाएदार में

    my heart, these dismal ruins, cannot now placate

    who can find sustenance in this unstable state

    कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें

    इतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दाग़-दार में

    desires should be told to find some alternate

    this scarred heart has no room to accomodate

    काँटों को मत निकाल चमन से बाग़बाँ

    ये भी गुलों के साथ पले हैं बहार में

    a long life, four days in all, I did negotiate

    two were spent in hope and two were spent in wait

    बुलबुल को बाग़बाँ से सय्याद से गिला

    क़िस्मत में क़ैद लिक्खी थी फ़स्ल-ए-बहार में

    ---

    ---

    कितना है बद-नसीब 'ज़फ़र' दफ़्न के लिए

    दो गज़ ज़मीन भी मिली कू-ए-यार में

    ---

    ---

    वीडियो
    This video is playing from YouTube

    Videos
    This video is playing from YouTube

    मोहम्मद रफ़ी

    मोहम्मद रफ़ी

    हबीब वली मोहम्मद

    हबीब वली मोहम्मद

    मोहम्मद रफ़ी

    मोहम्मद रफ़ी

    RECITATIONS

    हबीब वली मोहम्मद

    हबीब वली मोहम्मद

    हबीब वली मोहम्मद

    लगता नहीं है दिल मिरा उजड़े दयार में हबीब वली मोहम्मद

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Lorem ipsum dolor sit amet, consectetur adipiscing elit. Morbi volutpat porttitor tortor, varius dignissim.

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY