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जुरअत क़लंदर बख़्श

1748 - 1809 | लखनऊ, भारत

अपनी शायरी में महबूब के साथ मामला-बंदी के मज़मून के लिए मशहूर, नौजवानी में नेत्रहीन हो गए

अपनी शायरी में महबूब के साथ मामला-बंदी के मज़मून के लिए मशहूर, नौजवानी में नेत्रहीन हो गए

जुरअत क़लंदर बख़्श

ग़ज़ल 78

शेर 130

इलाही क्या इलाक़ा है वो जब लेता है अंगड़ाई

मिरे सीने में सब ज़ख़्मों के टाँके टूट जाते हैं

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मिल गए थे एक बार उस के जो मेरे लब से लब

उम्र भर होंटों पे अपने मैं ज़बाँ फेरा किए

लब-ए-ख़याल से उस लब का जो लिया बोसा

तो मुँह ही मुँह में अजब तरह का मज़ा आया

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उस ज़ुल्फ़ पे फबती शब-ए-दीजूर की सूझी

अंधे को अँधेरे में बड़ी दूर की सूझी

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अहवाल क्या बयाँ मैं करूँ हाए तबीब

है दर्द उस जगह कि जहाँ का नहीं इलाज

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क़ितआ 1

 

क़िस्सा 1

 

पुस्तकें 6

Deewan Jurat

 

1912

Kulliyat-e-Jurat

 

1971

Kulliyat-e-Jurat

Volume-001

1970

कुल्लियात-ए-जुर्अत

खण्ड-001

1968

मुंतख़ब दीवान-ए-जुरअत

गुलदस्ता-ए- मसर्रत

1868

Qalandar Bakhsh Jurat

 

1990

 

चित्र शायरी 3

चली जाती है तू ऐ उम्र-ए-रफ़्ता ये हम को किस मुसीबत में फँसा कर

दिल-ए-वहशी को ख़्वाहिश है तुम्हारे दर पे आने की दिवाना है व-लेकिन बात करता है ठिकाने की

अब इश्क़ तमाशा मुझे दिखलाए है कुछ और कहता हूँ कुछ और मुँह से निकल जाए है कुछ और नासेह की हिमाक़त तो ज़रा देखियो यारो समझा हूँ मैं कुछ और मुझे समझाए है कुछ और क्या दीदा-ए-ख़ूँ-बार से निस्बत है कि ये अब्र बरसाए है कुछ और वो बरसाए कुछ और रोने दे, हँसा मुझ को न हमदम कि तुझे अब कुछ और ही भाता है मुझे भाए है कुछ और पैग़ाम-बर आया है ये औसान गँवाए पूछूँ हूँ मैं कुछ और मुझे बतलाए है कुछ और 'जुरअत' की तरह मेरे हवास अब नहीं बर जा कहता हूँ कुछ और मुँह से निकल जाए है कुछ और

 

ऑडियो 6

ऐ दिला हम हुए पाबंद-ए-ग़म-ए-यार कि तू

इतना बतला मुझे हरजाई हूँ मैं यार कि तू

ऐ दिला हम हुए पाबंद-ए-ग़म-ए-यार कि तू

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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