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अमानत लखनवी

1815 - 1858 | लखनऊ, भारत

अपने नाटक 'इन्द्र सभा' के लिए प्रसिद्ध, अवध के आख़िरी नवाब वाजिद अली शाह के समकालीन

अपने नाटक 'इन्द्र सभा' के लिए प्रसिद्ध, अवध के आख़िरी नवाब वाजिद अली शाह के समकालीन

अमानत लखनवी

ग़ज़ल 13

शेर 15

बोसा आँखों का जो माँगा तो वो हँस कर बोले

देख लो दूर से खाने के ये बादाम नहीं

किस तरह 'अमानत' रहूँ ग़म से मैं दिल-गीर

आँखों में फिरा करती है उस्ताद की सूरत

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जी चाहता है साने-ए-क़ुदरत पे हूँ निसार

बुत को बिठा के सामने याद-ए-ख़ुदा करूँ

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किस क़दर दिल से फ़रामोश किया आशिक़ को

कभी आप को भूले से भी मैं याद आया

महशर का किया वा'दा याँ शक्ल दिखलाई

इक़रार इसे कहते हैं इंकार इसे कहते हैं

पुस्तकें 16

Amanat Indr Sabha

Madari Lal Indr Sabha

1897

गुलदस्ता-ए-अमानत

 

1887

इंद्र-सभा

 

1926

Indr Sabha

 

1981

Indr Sabha

 

 

Indr Sabha Amanat

 

 

Indr Sabha Amanat

Indr Sabha Madari lal

1875

Indr Sabha Amanat

 

1950

Indr Sabha Amanat Ba-Tasveer

 

 

Indr Sabha Aur Indra Sabhaein

 

1980

ऑडियो 10

आग़ोश में जो जल्वागर इक नाज़नीं हुआ

उलझा दिल-ए-सितम-ज़दा ज़ुल्फ़-ए-बुताँ से आज

ख़ाना-ए-ज़ंजीर का पाबंद रहता हूँ सदा

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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