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लाला माधव राम जौहर

1810 - 1890

हर मौक़े पर याद आने वाले कई शेर देने वाले विख्यात शायर , मिर्ज़ा ग़ालिब के समकालीन।

हर मौक़े पर याद आने वाले कई शेर देने वाले विख्यात शायर , मिर्ज़ा ग़ालिब के समकालीन।

ग़ज़ल 39

शेर 174

भाँप ही लेंगे इशारा सर-ए-महफ़िल जो किया

ताड़ने वाले क़यामत की नज़र रखते हैं

ग़ैरों से तो फ़ुर्सत तुम्हें दिन रात नहीं है

हाँ मेरे लिए वक़्त-ए-मुलाक़ात नहीं है

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तुझ सा कोई जहान में नाज़ुक-बदन कहाँ

ये पंखुड़ी से होंट ये गुल सा बदन कहाँ

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ई-पुस्तक 2

इंशा-ए-माधो राम

 

 

 

चित्र शायरी 5

ख़्वाब में नाम तिरा ले के पुकार उठता हूँ बे-ख़ुदी में भी मुझे याद तिरी याद की है

थमे आँसू तो फिर तुम शौक़ से घर को चले जाना कहाँ जाते हो इस तूफ़ान में पानी ज़रा ठहरे

दिल को समझाओ ज़रा इश्क़ में क्या रक्खा है किस लिए आप को दीवाना बना रक्खा है ये तो मालूम है बीमार में क्या रक्खा है तेरे मिलने की तमन्ना ने जिला रक्खा है कौन सा बादा-कश ऐसा है कि जिस की ख़ातिर जाम पहले ही से साक़ी ने उठा रक्खा है अपने ही हाल में रहने दे मुझे ऐ हमदम तेरी बातों ने मिरा ध्यान बटा रक्खा है आतिश-ए-इश्क़ से अल्लाह बचाए सब को इसी शोले ने ज़माने को जला रक्खा है मैं ने ज़ुल्फ़ों को छुआ हो तो डसें नाग मुझे बे-ख़ता आप ने इल्ज़ाम लगा रक्खा है कैसे भूले हुए हैं गब्र ओ मुसलमाँ दोनों दैर में बुत है न काबे में ख़ुदा रक्खा है

वही शागिर्द फिर हो जाते हैं उस्ताद ऐ 'जौहर' जो अपने जान-ओ-दिल से ख़िदमत-ए-उस्ताद करते हैं

दोस्त दिल रखने को करते हैं बहाने क्या क्या रोज़ झूटी ख़बर-ए-वस्ल सुना जाते हैं

 

ऑडियो 6

आ गया दिल जो कहीं और ही सूरत होगी

थोड़ा है जिस क़दर मैं पढ़ूँ ख़त हबीब का

बुत-कदे में न तुझे काबे के अंदर पाया

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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