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ग़ज़ल
कुछ ग़म-ए-जानाँ कुछ ग़म-ए-दौराँ दोनों मेरी ज़ात के नाम
एक ग़ज़ल मंसूब है उस से एक ग़ज़ल हालात के नाम
मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद
ग़ज़ल
शाद अज़ीमाबादी
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ग़ज़ल
तुम्हारे सारे मंसूबों का नस्लों पर अहाता है
सदा आती है उम्र-ए-मुख़्तसर की बात मत सोचो
हामिद इक़बाल सिद्दीक़ी
नज़्म
जब जंगल बस्ती में आया
जो बरसों में पूरे होंगे ऐसे मंसूबों की बातें कहती हैं
हम सब ज़िंदा हैं
फ़ज़्ल ताबिश
नज़्म
जश्न-ए-साल-ए-नौ
ये नया साल भी क्या देगा बताता हूँ तुम्हें
इस के मंसूबों का अफ़्साना सुनाता हूँ तुम्हें
