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नज़्म
दरिया-ए-गोमती
है 'वासिय्या' भी तिरी मरहून-ए-मिन्नत गोमती
फिर लिखूँगी और मिल जाए जो फ़ुर्सत गोमती
फ़ातिमा वसीया जायसी
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नज़्म
जहाँ ज़ाद
मोहब्बत की बाज़ी में बे-जान पत्ते की सूरत
किसी दस्त-ए-चाबुक की मरहून-ए-मिन्नत
इशरत आफ़रीं
ग़ज़ल
ग़ज़ल अश'आर तेरे हुस्न के मरहून-ए-मिन्नत हैं
ये ज़न तेरी बदौलत है सुख़न-वर कुछ नहीं होता
मीम मारूफ़ अशरफ़
नज़्म
समुंदर
नौ-ए-इंसाँ की ख़ुशी मरहून-ए-मिन्नत है तिरी
दूसरों पर हो अता गोया ये जन्नत है तिरी
सलमान ग़ाज़ी
ग़ज़ल
बड़ा मरहून-ए-मिन्नत हूँ तिरा ऐ गर्दिश-ए-दौराँ
कि तेरी ठोकरों ने कर दिया साबित-क़दम मुझ को
अब्दुल मलिक सोज़
ग़ज़ल
मैं हूँ मरहून-ए-मिन्नत सुल्ह-ए-कुल का जब से ऐ 'अरशद'
यक़ीन-ए-दोस्ती होने लगा है मुझ को दुश्मन पर
मिर्ज़ा अब्दुल ग़फ़ूर गोरगानी अरशद
ग़ज़ल
मुहिब आरफ़ी
ग़ज़ल
मिन्नत-ए-क़ासिद कौन उठाए शिकवा-ए-दरबाँ कौन करे
नामा-ए-शौक़ ग़ज़ल की सूरत छपने को दो अख़बार के बीच