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नज़्म
रात और रेल
तेज़-तर होती हुई मंज़िल-ब-मंज़िल दम-ब-दम
रफ़्ता रफ़्ता अपना असली रूप दिखलाती हुई
असरार-उल-हक़ मजाज़
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नज़्म
लब-ए-जू-ए-बारे
बर्क़-रफ़्तारी से इक तीर कमाँ ने छोड़ा
और वो ख़म खा के लचकता हुआ थर्रा के गिरा
मीराजी
ग़ज़ल
शोख़-रफ़्तारी का अपनी देख तो मुड़ कर असर
साथ साथ उठ कर रवाँ हर नक़्श-ए-पा होने को है
ख़्वाजा अज़ीज़ुल हसन मज्ज़ूब
ग़ज़ल
वो आवारा हूँ मैं है ख़त्म मुझ पर तेज़-रफ़्तारी
कि हैं मिक़राज़ दोनों पाँव मेरे क़त-ए-मंज़िल में
सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम
ग़ज़ल
हाफ़िज़े की सुस्त-रौ लहरों में हलचल क्या हुई
जाग उट्ठे धड़कनों की तेज़-रफ़्तारी के दिन
अब्दुल अहद साज़
ग़ज़ल
ये न हो कि ना-मुकम्मल ही रहे मंज़िल का ख़्वाब
तेज़-रफ़्तारी में लग जाती है ठोकर देखना
मुर्तज़ा बरलास
नज़्म
अँदेशा-ए-विसाल की एक नज़्म
लहू की बर्क़-रफ़्तारी तनाबें खेंच लेती है
ये कैसी शाम-ए-शहज़ादी
अब्बास ताबिश
नज़्म
जश्न-ए-आज़ादी
बर्क़-रफ़्तारी पे अपनी रश्क करता था जहाँ
सू-ए-आज़ादी हमारा क़ाफ़िला था तेज़-गाम
अर्श मलसियानी
हास्य
राह-ए-उल्फ़त की ट्रैफ़िक हो कि मोटर-वे की हो
हादसे होते हैं 'शाहिद' तेज़-रफ़्तारी के ब'अद

