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नज़्म
जो लोग रातों को जागते थे
वो रिज़्क़-ए-ख़ाशाक बन चुके थे
तमाम मंज़र तमाम चेहरे जो धीरे धीरे सुलग रहे थे
असअ'द बदायुनी
ग़ज़ल
ख़ार-ओ-ख़स-ओ-ख़ाशाक तो जानें एक तुझी को ख़बर न मिले
ऐ गुल-ए-ख़ूबी हम तो 'अबस बदनाम हुए गुलज़ार के बीच
इब्न-ए-इंशा
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नज़्म
ज़ीस्त-मिज़ाजों का नौहा
पर तुझे फ़ुर्सत-ए-नज़्ज़ारा-ए-ख़ाशाक नहीं
तेरी आँखों में फ़रोज़ाँ है सितारों का वफ़ूर