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ग़ज़ल
हज़ार सदियों की रौंदी हुई ज़मीं है 'नसीम'
नहीं हूँ मैं कि जिसे पहला पाँव धरना है
इफ़्तिख़ार नसीम
नज़्म
नई दुनिया
जहाँ अरमाँ भरे दिल ख़ून के आँसू न रोते हों
जहाँ रौंदी न जाती हो ख़ुशी अहल-ए-मोहब्बत की
राजेन्द्र नाथ रहबर
ग़ज़ल
मेरे पैरों को है कुछ रौंदी हुई राहों से बैर
जिस तरफ़ कोई नहीं जाता उधर जाता हूँ मैं
आनंद नारायण मुल्ला
नज़्म
लंदन की एक शाम
मिरे शबाब की रौंदी हुई ये राहें हैं
वही मक़ाम है लेकिन वही मक़ाम नहीं