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ग़ज़ल
उमडा है दरिया दर्द का या-रब मुझे रुस्वा न कर
आया है जोश उस देग कूँ सर-पोश हो सर-पोश हो
सिराज औरंगाबादी
ग़ज़ल
मिरी अश्कों की तुग़्यानी 'हया' क्या सर उठाएँगी
समुंदर सा निहाँ है चर्ख़ के सर-पोश में दरिया
मिर्ज़ा रहीमुद्दीन हया
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ग़ज़ल
उल्फ़त में दिल उमडते ही सर तन से उड़ गया
सर-पोश जोश-ए-मय से न ठहरा मठोर पर
पंडित दया शंकर नसीम लखनवी
ग़ज़ल
आफ़ियत चाहो तो झुक जाओ सर-ए-पा-पोश-ए-वक़्त
फिर ये दस्तार-ए-फ़ज़ीलत अपने सर पर बाँध लो
हिमायत अली शाएर
ग़ज़ल
मुद्दतों ब'अद नक़ाब उस ने उठाई रुख़ से
सर-ब-सर शोला वो निकला जो सियह-पोश रहा