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शेर
वो ख़ुदाई कर रहे थे जब ख़ुदा होने से क़ब्ल
तो ख़ुदा जाने करेंगे क्या ख़ुदा होने के बा'द
नूह नारवी
शेर
रौशनी में लफ़्ज़ के तहलील हो जाने से क़ब्ल
इक ख़ला पड़ता है जिस में घूमता रहता हूँ मैं
महेंद्र कुमार सानी
शेर
फ़ज़ा-ए-मस्मूम में साँस ले कर कोई जिया भी तो क्या करेगा
ज़ईफ़ होने से क़ब्ल ही जब शबाब ढल जाए आदमी का