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शेर
मुस्कुराता हूँ तो रोता है मिरा ज़ख़्म-ए-जिगर
रोने लगता हूँ तो होंटों को चुभन होती है
महवर सिरसिवी
शेर
आब-दीदा हूँ मैं ख़ुद ज़ख़्म-ए-जिगर से अपने
तेरी आँखों में छुपा दर्द कहाँ से देखूँ
मोहम्मद असदुल्लाह
शेर
इनायत की करम की लुत्फ़ की आख़िर कोई हद है
कोई करता रहेगा चारा-ए-ज़ख़्म-ए-जिगर कब तक
फ़िराक़ गोरखपुरी
शेर
ज़ख़्म-ए-शमशीर-ए-निगह हैफ़ कि अच्छा न हुआ
करने को उस की दवा डॉक्टर अंग्रेज़ आया
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शेर
फट जाते हैं ज़ख़्म-ए-दिल-ए-बेताब के अंगूर
साक़ी तिरे हाथों से जो साग़र नहीं मिलता
पीर शेर मोहम्मद आजिज़
शेर
खावेंगे टाँके ज़ख़्म-ए-सर-ओ-रू पर ऐ तबीब
पर ज़ख़्म-ए-दिल तो हम से सिलाया न जाएगा
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शेर
कुछ तो है वैसे ही रंगीं लब ओ रुख़्सार की बात
और कुछ ख़ून-ए-जिगर हम भी मिला देते हैं
आल-ए-अहमद सुरूर
शेर
ख़ंदा-ए-लब में निहाँ ज़ख़्म-ए-हुनर देखेगा कौन
बज़्म में हैं सब के सब अहल-ए-नज़र देखेगा कौन
मोहसिन भोपाली
शेर
ज़ख़्म-ए-दिल दाग़-ए-जिगर दाग़-ए-तमन्ना की क़सम
चाँद से फूल से डर हम को यहाँ होता है