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शेर
इन बुतों ने मुझ को बे-ख़ुद किस क़दर धोके दिए
सीधा-सादा जान कर मर्द-ए-मुसलमाँ देख कर
अब्बास अली ख़ान बेखुद
शेर
मरजा-ए-गब्र-ओ-मुसलमाँ है वो बुत नाम-ए-ख़ुदा
भेजते हैं उसे हिन्दू ओ मुसलमाँ काग़ज़
मातम फ़ज़ल मोहम्मद
शेर
काश सोता ही रहूँ मैं कि नहीं चाहता दिल
हर सहर उठ के रुख़-ए-गब्र-ओ-मुसलमाँ देखूँ
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शेर
पीर-ए-मुग़ाँ के पास वो दारू है जिस से 'ज़ौक़'
नामर्द मर्द मर्द-ए-जवाँ-मर्द हो गया
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
शेर
दिलों में गब्र-ओ-मुसलमाँ ज़रा ख़याल करें
ख़ुदा के वास्ते क़िस्से का इंफ़िसाल करें
वज़ीर अली सबा लखनवी
शेर
कैसे भूले हुए हैं गब्र ओ मुसलमाँ दोनों
दैर में बुत है न काबे में ख़ुदा रक्खा है
लाला माधव राम जौहर
शेर
जब कि ले ज़ुल्फ़ तिरी मुसहफ़-ए-रुख़ का बोसा
फिर यहाँ फ़र्क़ हो हिन्दू ओ मुसलमान में क्या
शाह नसीर
शेर
मुल्हिद हूँ अगर मैं तो भला इस से तुम्हें क्या
मुँह से ये सुख़न गब्र ओ मुसलमाँ न निकालो
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शेर
ढूँढ तो बुत भी यहीं मिल जाएँगे मर्द-ए-ख़ुदा
हम ने देखा है हरम ही में कहीं बुत-ख़ाना था
नातिक़ गुलावठी
शेर
शायद उसी का ज़िक्र हो यारो मैं इस लिए
सुनता हूँ गोश-ए-दिल से हर इक मर्द-ओ-ज़न की बात