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शेर
हज़ारों मौसमों की हुक्मरानी है मिरे दिल पर
'वसी' मैं जब भी हँसता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं
वसी शाह
शेर
शर्म कब तक ऐ परी ला हाथ कर इक़रार-ए-वस्ल
अपने दिल को सख़्त कर के रिश्ता-ए-इंकार तोड़
मुनीर शिकोहाबादी
शेर
जो चश्म-ए-दिल-रुबा के वस्फ़ में अशआ'र लिखता हूँ
तो हर हर लफ़्ज़ पर अहल-ए-नज़र इक साद करते हैं
दत्तात्रिया कैफ़ी
शेर
हर इक मुफ़लिस के माथे पर अलम की दास्तानें हैं
कोई चेहरा भी पढ़ता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं
वसी शाह
शेर
वस्फ़ अँखियों का लिखा हम ने गुल-ए-बादाम पर
कर के नर्गिस को क़लम और चश्म-ए-आहू की दवात
शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
शेर
सवाल-ए-वस्ल पर कुछ सोच कर उस ने कहा मुझ से
अभी वादा तो कर सकते नहीं हैं हम मगर देखो
बेख़ुद देहलवी
शेर
एक मलाल की गर्द समेटे मैं ने ख़ुद को पार किया
कैसे कैसे वस्ल गुज़ारे हिज्र का ज़ख़्म छुपाने में
अज़्म बहज़ाद
शेर
साहिल पर आ के लगती है टक्कर सफ़ीने को
हिज्राँ से वस्ल में है सिवा दिल की एहतियात
सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम
शेर
अब के वस्ल का मौसम यूँही बेचैनी में बीत गया
उस के होंटों पर चाहत का फूल खिला भी कितनी देर