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शेर
जाने क्या भर दी हैं उस ने इस चमन में शोख़ियाँ
जो भी आया वो चमन का राज़-दाँ बनता गया
कलीम अहमदाबादी
शेर
उसे सुब्ह-ए-अज़ल इंकार की जुरअत हुई क्यूँकर
मुझे मालूम क्या वो राज़-दाँ तेरा है या मेरा