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शेर
मैं रिज़्क़-ए-ख़्वाब हो के भी उसी ख़याल में रहा
वो कौन है जो ज़िंदगी के इम्तिहान में नहीं
ग़ुलाम हुसैन साजिद
शेर
ज़बान-ए-हाल से ये लखनऊ की ख़ाक कहती है
मिटाया गर्दिश-ए-अफ़्लाक ने जाह-ओ-हशम मेरा