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ग़ज़ल
ख़ुद को मिट्टी मिट्टी कर के आहें गिर्या ज़ारी शोर
तुम क्या जानो रूठने वाले यार मनाना क्या होता है
कँवल मलिक
ग़ज़ल
चार बरस से बेगाने हैं सो हम क्या बेगाने हैं
रूठने वाला जीवन-साथी दो दिन में मन जाएगा
जमीलुद्दीन आली
ग़ज़ल
आपस में रूठने का अंदाज़ हो तो ये हो
वो हम से फट रहे हों हम उन से फट रहे हों