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ग़ज़ल
ता-कुजा ये पर्दा-दारी-हा-ए-इश्क़-ओ-लाफ़-ए-हुस्न
हाँ सँभल जाएँ दो-आलम होश में आता हूँ मैं
जिगर मुरादाबादी
ग़ज़ल
'मोमिन' ये लाफ़-ए-उल्फ़त-ए-तक़्वा है क्यूँ मगर
दिल्ली में कोई दुश्मन-ए-ईमाँ नहीं रहा
मोमिन ख़ाँ मोमिन
ग़ज़ल
शाने की हर ज़बाँ से सुने कोई लाफ़-ए-ज़ुल्फ़
चीरे है सीना रात को ये मू-शिगाफ़-ए-ज़ुल्फ़
बहादुर शाह ज़फ़र
ग़ज़ल
ग़ैर की लाफ़-ज़नी पर भी रहे पास-ए-अदब
कोई अंगुश्त-ब-दंदाँ हो ज़रूरी तो नहीं
कुँवर महेंद्र सिंह बेदी सहर
ग़ज़ल
ये कलाम-उल-लाह कब है जो सदा बाक़ी रहे
दार-ए-फ़ानी से चले हैं नक़्श-ए-फ़ानी छोड़ कर
हसन शाहनवाज़ ज़ैदी
ग़ज़ल
क्यों पूछते हैं ख़ुद को कहाँ देखते हैं कल
ख़ाकी हैं ख़ुद को ख़ाक में लफ़ देखते हैं बस
उमैर नजमी
ग़ज़ल
क्यूँ ख़राबात में लाफ़-ए-हमा-दानी वा'इज़
कौन सुनता है तिरी हर्ज़ा-बयानी वा'इज़
मुंशी अमीरुल्लाह तस्लीम
ग़ज़ल
हाँ मियाँ सच है तुम्हारी तो बला ही जाने
जो गुज़रती है मिरे दिल पे ख़ुदा ही जाने