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ग़ज़ल
गर फिर भी अश्क आएँ तो जानूँ कि इश्क़ है
हुक़्क़े का मुँह से ग़ैर की जानिब धुआँ न छोड़
मोमिन ख़ाँ मोमिन
ग़ज़ल
वहशत में क़ैद-ए-दैर-ओ-हरम दिल से उठ गई
हक़्क़ा कि मुझ को इश्क़ ने रस्ता बता दिया
मिर्ज़ा रज़ा बर्क़
ग़ज़ल
इसी ग़रज़ से मैं ख़ुद को अक्सर टटोलता हूँ
कहाँ पे किस का है कितना हिस्सा निकालना है
सलीम सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
जो दम हुक़्क़े का दूँ बोले कि मैं हुक़्क़ा नहीं पीता
भरूँ जल्दी से गर सुल्फ़ा कहे सुल्फ़ा नहीं पीता
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
करते हैं जो वो फ़ख़्र दो अबरू पे बजा है
हक़्क़ा कि ये मतला है मबाहात के क़ाबिल
मुज़फ़्फ़र अली असीर
ग़ज़ल
تجھ چک کوں کوئی کھنجن کتے کوئی ساحر پرفن کتے
کوئی حقۂ انجن کتے کوئی کچھ کتے کوئی کچھ کتے
अबुल हसन ताना शाह
ग़ज़ल
इन लबों के बोसे के लालच में जलता है बहिश्त
सुन ले 'उज़लत' कान धर कहता है हुक़्क़ा गुड़गुड़ा
वली उज़लत
ग़ज़ल
सच कहते हैं शैख़ 'अकबर' है ताअत-ए-हक़ लाज़िम
हाँ तर्क-ए-मय-ओ-शाहिद ये उन की बुज़ुर्गी है
अकबर इलाहाबादी
ग़ज़ल
माने-ए-इज़हार तुम को है हया, हम को अदब
कुछ तुम्हारे दिल के अंदर कुछ हमारे दिल में है