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ग़ज़ल
वो जिस पे तुम्हें शम-ए-सर-ए-रह का गुमाँ है
वो शो'ला-ए-आवारा हमारी ही ज़बाँ है
मजरूह सुल्तानपुरी
ग़ज़ल
किसी की याद में मिस्ल-ए-चराग़-ए-रह-गुज़र तन्हा
गुज़ारी है शब-ए-ग़म हम ने अक्सर जाग कर तन्हा
ज़फ़र संभली
ग़ज़ल
सर-ए-रह अब न यूँ मुझ को पुकारो तुम ही आ जाओ
ज़रा ज़हमत तो होगी राज़-दारो तुम ही आ जाओ
शकेब जलाली
ग़ज़ल
मिरी ख़ाक उस ने बिखेर दी सर-ए-रह ग़ुबार बना दिया
मैं जब आ सका न शुमार में मुझे बे-शुमार बना दिया
इक़बाल कौसर
ग़ज़ल
निपटेंगे दिल से मार्का-ए-रह-गुज़र के ब'अद
लेंगे सफ़र का जाएज़ा ख़त्म-ए-सफ़र के ब'अद
परवेज़ शाहिदी
ग़ज़ल
हरीम-ए-नाज़ की ख़ल्वत में दस्तरस है किसे
नज़ारा-हा-ए-सर-ए-रह-गुज़र की बात करो
सूफ़ी ग़ुलाम मुस्ताफ़ा तबस्सुम
ग़ज़ल
बस अब हम से दिल-ए-शोरीदा-सर देखा नहीं जाता
ये तड़पाना तड़पना रात भर देखा नहीं जाता
क़ैसर हैदरी देहलवी
ग़ज़ल
अजब सौदा-ए-वहशत है दिल-ए-ख़ुद-सर में रहता है
ये कैसी छब का मालिक है ये कैसे घर में रहता है
अब्बास ताबिश
ग़ज़ल
दिल-ए-शोरीदा-सर है और मैं हूँ
हरीफ़-ए-फ़ित्ना-गर है और मैं हूँ