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ग़ज़ल
हाथ मेरा भी जो पहुँचा तो मैं समझूँगा ख़ूब
ये अँगूठा तू किसी और को दिखलाया कर
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
मैं उस धरती का वासी हूँ जहाँ चेले क़लम कर के
गुरु के चरनों में अपना अँगूठा डाल देते हैं
मोहम्मद इश्तियाक़ आलम
ग़ज़ल
बहुत पेपर पे छपने हैं तो ठप्पा काट लेते हैं
पिता जी मर गए हैं तो अँगूठा काट लेते हैं
आतिश इंदौरी
ग़ज़ल
अँगूठा-छाप शा'इर हूँ मिरा 'इल्म-ओ-हुनर क्या है
सताइश का सिला कैसा मज़म्मत में ज़रर क्या है
सुश्रुत पंत ज़र्रा
ग़ज़ल
वो मुंकिर है तो फिर शायद हर इक मकतूब-ए-शौक़ उस ने
सर-अंगुश्त-ए-हिनाई से ख़लाओं में लिखा होगा
जौन एलिया
ग़ज़ल
भीतर से ख़ालिस जज़्बाती और ऊपर से ठेठ पिता
अलग अनूठा अनबूझा सा इक तेवर थे बाबू जी