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ग़ज़ल
मिरी रिफ़अ'तों से लर्ज़ां कभी मेहर-ओ-माह ओ अंजुम
मिरी पस्तियों से ख़ाइफ़ कभी औज-ए-ख़ुसरवाना
मुईन अहसन जज़्बी
ग़ज़ल
बहुत ऊँचा उड़ा लेकिन अब इस ओज-ए-तख़य्युल से
किसी दुनिया-ए-रंगीं में उतरता जा रहा हूँ मैं
नुशूर वाहिदी
ग़ज़ल
ख़ुदा जाने ये है औज-ए-यकीं या पस्ती-ए-हिम्मत
ख़ुदा से कह रहा हूँ ना-ख़ुदा होने का वक़्त आया
हरी चंद अख़्तर
ग़ज़ल
कभी तो आरज़ी सा इक तबस्सुम लब पे आने दे
कभी तो मेहरबाँ मुझ पर मिरे ना-मेहरबाँ हो जा
अर्श मलसियानी
ग़ज़ल
मुंतख़ब करते हैं मैदान-ए-शिकस्त अपने लिए
ख़ाक पर गिरते हैं लेकिन औज-ए-सुल्तानी से हम
अहमद जावेद
ग़ज़ल
अर्श-ए-आज़म से भी ऊँची हो गई मेरी फ़ुग़ाँ
आज तक पाया न ऐ 'आज़ाद' औज-ए-बाम-ए-इ'श्क़