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ग़ज़ल
वो जो हुए फ़िरदौस-बदर तक़्सीर थी वो आदम की मगर
मेरा अज़ाब-ए-दर-बदरी मेरी ना-कर्दा-गुनाही है
मजरूह सुल्तानपुरी
ग़ज़ल
सो रहा हूँ मैं कि ये जागा हुआ सा ख़्वाब है
ला-शु'ऊरी वुस'अतों में ऊँघता सा ख़्वाब है