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ग़ज़ल
झुक गया सर अर्ज़-ए-मतलब पर बरा-ए-इख़्तिसार
हम ने चाहा था कि अफ़्साना-दर-अफ़्साना कहें
कँवल एम ए
ग़ज़ल
मैं ने इक हक़ बात कह दी थी ख़िलाफ़-ए-मस्लहत
तब से सुनता हूँ ख़फ़ा हैं मेरे हम-साए बहुत
एम ए क़दीर
ग़ज़ल
फ़ी-ज़माना है यही मस्लहत-ए-अक़्ल-ओ-शुऊर
दिल में ख़्वाहिश कोई उभरे तो दबा ली जाए
शान-ए-हैदर बेबाक अमरोहवी
ग़ज़ल
आले रज़ा रज़ा
ग़ज़ल
ख़ुशी मेरी गवारा थी न क़िस्मत को न दुनिया को
सो मैं कुछ ग़म बरा-ए-ख़ातिर-ए-अहबाब उठा लाई
हुमैरा राहत
ग़ज़ल
मिरा नहीं न सही पर बरा-ए-'अज़्मत-ए-'इश्क़
किसी का ख़्वाब तो आँखों में तेरी पल जाए
मुहम्मद शकील अख़्तर
ग़ज़ल
दामन में गुल नहीं तो बरा-ए-सुबूत-ए-सैर
सेहन-ए-चमन से ख़ार के नश्तर ही ले चलें
उरूज ज़ैदी बदायूनी
ग़ज़ल
हो बरा-ए-शाम-ए-हिज्राँ लब-ए-नाज़ से फ़रोज़ाँ
कोई एक शम्-ए-पैमाँ कोई इक चराग़-ए-व'अदा