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ग़ज़ल
दिल शाहजहाँपुरी
ग़ज़ल
वो और होंगे नुफ़ूस बे-दिल जो कहकशाएँ शुमारते हैं
ये रात है पूरे चाँद की हम तिरी मोहब्बत हिसारते हैं
साबिर
ग़ज़ल
ठहर जा नाक़ा-ए-दिलबर कि मैं चूमूँ क़दम तेरे
सदा ये मुश्त-ए-ख़ाक-ए-आशिक़-ए-बे-दिल से निकलेगी