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ग़ज़ल
क्या तीर-ए-सितम उस के सीने में भी टूटे थे
जिस ज़ख़्म को चीरूँ हूँ पैकान निकलते हैं
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
क़स्में तो सारी हो चुकीं बाक़ी रही है अब
पीपल तले के भुतने की शैतान की क़सम
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
ग़ज़ल
ज़ख़्म पर छिड़कें कहाँ तिफ़्लान-ए-बे-परवा नमक
क्या मज़ा होता अगर पत्थर में भी होता नमक