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ग़ज़ल
आग़ाज़-ए-मोहब्बत है और दिल यूँ हाथ से निकला जाता है
जैसे किसी अल्हड़ का आँचल सरका जाए ढलका जाए
नुशूर वाहिदी
ग़ज़ल
फ़िरोज़ नातिक़ ख़ुसरो
ग़ज़ल
हिज्र की शब में जो मेरी आँख से ढलका नहीं
वो सितारा था जो सुब्ह-ए-वस्ल में चमका भी था
ताजदार आदिल
ग़ज़ल
मा'सूम से दो दिल क्या धड़के बे-पर की उड़ाई लोगों ने
ख़ामोश मोहब्बत भड़का दी वो आग लगाई लोगों ने