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ग़ज़ल
क्यूँ नदामत हो मुझे ला-इख़्तियारी फ़ेल पर
मैं तिरी नज़रों में रुस्वा हो गया तो हो गया
फ़ैज़ आलम बाबर
ग़ज़ल
कब तसव्वुर यार-ए-गुल-रुख़्सार का फ़े'ल-ए-अबस
इश्क़ है इस गुलशन-ओ-गुलज़ार का फ़े'ल-ए-अबस
बहराम जी
ग़ज़ल
‘इरफ़ान-ए-'इश्क़ तोड़ दे ज़ंजीर-ए-फ़े'ल को
रुक जाएँ अपने आप ही आवागवन के पाँव
चंद्रशेखर पाण्डेय शम्स
ग़ज़ल
न इतरा ऐ दिल-ए-नादाँ किसी के अहद-ओ-पैमाँ पर
कि क़ौल ओ फ़ेल क्या लोगों की तहरीरें बदलती हैं
ख़ार देहलवी
ग़ज़ल
क़ौल और फ़े'ल में देखा है तज़ाद उन के भी
जिन की दुनिया में है मशहूर मसीहाई बहुत