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ग़ज़ल
मह-ए-चार-दह का आलम मैं दिखाऊँगा फ़लक को
अगर उस ने पर्दा मुँह से शब-ए-माहताब उल्टा
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
ख़ुद-फ़रोशी को जो निकला वो अज़ीज़-ए-आलम
नर्ख़-ए-हुस्न-ए-मह-ए-कनआँ' सर-ए-बाज़ार घटा
कामरान जान मुश्तरी
ग़ज़ल
खोल कर आँखें ज़रा ये हुस्न-ए-महर-ओ-माह देख
दीद के क़ाबिल है ज़र्रा चर्ख़ पर पहुँचा हुआ