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ग़ज़ल
हुई जिन से तवक़्क़ो' ख़स्तगी की दाद पाने की
वो हम से भी ज़ियादा ख़स्ता-ए-तेग़-ए-सितम निकले
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
'ग़ालिब'-ए-ख़स्ता के बग़ैर कौन से काम बंद हैं
रोइए ज़ार ज़ार क्या कीजिए हाए हाए क्यूँ
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
दर्शन सिंह
ग़ज़ल
उस के कूचे में है नित सूरत-ए-बेदाद नई
क़त्ल हर ख़स्ता बा-अंदाज़-ए-दिगर होता है
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
मरहम की जुस्तुजू में फिरा हूँ जो दूर दूर
तन से सिवा फ़िगार हैं इस ख़स्ता-तन के पाँव
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
बताएँ क्या तुझे अब ख़स्ता-हाली-ए-दिल 'राज़'
शिकस्ता ख़्वाब के टुकड़ों पे पल रहा है दोस्त
इस्माईल राज़
ग़ज़ल
उस ने भुला के आप को नज़रों से भी गिरा दिया
'नासिर'-ए-ख़स्ता-हाल फिर क्यूँ न उसे भुला सके
हकीम नासिर
ग़ज़ल
गर्द उड़ाते ज़र्द बगूले दर पर दस्तक देते थे
और ख़स्ता-दीवारों की पल भर में शक्ल बदलती थी
हम्माद नियाज़ी
ग़ज़ल
ग़ालिब कि ये दिल-ख़स्ता शब-ए-हिज्र में मर जाए
ये रात नहीं वो जो कहानी में गुज़र जाए
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
माने गर कोई नसीहत 'आरिफ़'-ए-दिल-ख़स्ता की
भूल कर भी वाला-ए-आतिश-बजाँ कोई न हो