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ग़ज़ल
ये हवा ये रात ये चाँदनी तिरी एक अदा पे निसार है
मुझे क्यूँ न हो तिरी आरज़ू तिरी जुस्तुजू में बहार है
राजेन्द्र कृष्ण
ग़ज़ल
ये लम्हा ज़ीस्त का बस आख़िरी है और मैं हूँ
हर एक सम्त से अब वापसी है और मैं हूँ