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ग़ज़ल
क़ब्र अपनी खोद कर ख़ुद लेट जाओ एक दिन
वक़्त किस के पास है मिट्टी उठाने के लिए
शिवकुमार बिलग्रामी
ग़ज़ल
टेढ़े-मेढ़े आले ले के जिस्म पे टूट पड़े हैं
शायद जान गए हैं हुस्न की मैं पूजा करता था
ओसामा ज़ाकिर
ग़ज़ल
मफ़्लूज रात कर्ब के बिस्तर पे लेट कर
करती है अब तो आह-ओ-फ़ुग़ाँ कम बहुत ही कम
पी पी श्रीवास्तव रिंद
ग़ज़ल
इक बड़े होटल की वीराँ चाँदनी पर लेट कर
जाने क्यों अपना तक़द्दुस खो रही थी चाँदनी