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ग़ज़ल
नमी-ए-अश्क के बाइस जो मिरी आह से रात
ज़ेर-ए-रुख़ तकिया-ए-मख़मल न जले ख़ुश्क तो हो
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
ग़ज़ल
आशिक़ के तईं अपने सज अपनी दिखाने को
मलमल का अंगरखा वो सौ बार पहन निकले
मिर्ज़ा मोहम्मद तक़ी हवस
ग़ज़ल
कुछ तो हवा भी सर्द थी कुछ था तिरा ख़याल भी
दिल को ख़ुशी के साथ साथ होता रहा मलाल भी