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ग़ज़ल
वो मानूस सलोने चेहरे जाने अब किस हाल में हैं
जिन को देख के ख़ाक का ज़र्रा ज़र्रा आँखें मलता था
ख़लील-उर-रहमान आज़मी
ग़ज़ल
डरता हूँ कि दिल हर दम मलता है न हो जावे
उस चश्म-ए-सितम-गर का बीमार ख़ुदा-हाफ़िज़
मीर मोहम्मदी बेदार
ग़ज़ल
मैं तो याँ इस बात पर अपने पड़ा मलता हूँ हाथ
और सारे शहर में कुछ और चर्चा पड़ गया