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ग़ज़ल
वही साथी है जो रफ़ीक़ है वही यार है जो सदीक़ है
वही मेहर है वही मामता तुम्हें याद हो कि न याद हो
इस्माइल मेरठी
ग़ज़ल
ख़ुदा ने मुझ को बिन-माँगे ये नेमत दी है 'मंज़र'
तरसते हैं बहुत से लोग ममता देखने को
मंज़र भोपाली
ग़ज़ल
गवारा कब है ममता को मिरा यूँ धूप में चलना
मिरी माँ ओढ़नी फैला के इक छाता बनाती है
साबिर शाह साबिर
ग़ज़ल
मेरे क़दमों से लिपट जाती है माँ की ममता
मैं कहीं गाँव से जाते हुए थक जाता हूँ