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ग़ज़ल
ऐ 'शम्अ'' किस ने दी थी तुझे ऐसी बद-दुआ'
घर में कोई चराग़ न जलता दिखाई दे
सय्यदा नफ़ीस बानो शम्अ
ग़ज़ल
वो शख़्स आया था ऐ 'शम्अ' ले के मौसम-ए-गुल
उसे ख़बर ही न थी दर्द मेरा ज़ेवर था
सय्यदा नफ़ीस बानो शम्अ
ग़ज़ल
हुजूम-ए-ग़म सँभलता ही नहीं ऐ 'शम्अ'' अब मुझ से
कभी तो काश ऐसा हो मुझे तन्हा करे कोई
सय्यदा नफ़ीस बानो शम्अ
ग़ज़ल
'शम्अ'' इतना तो कभी उस की समझ में आए
डूबती कश्ती का साहिल से तक़ाज़ा क्या है
सय्यदा नफ़ीस बानो शम्अ
ग़ज़ल
तिश्नगी की तफ़्सीरें मिस्ल-ए-शम्अ हैं 'वामिक़'
जो ज़बान खुलती है उस से लौ निकलती है
वामिक़ जौनपुरी
ग़ज़ल
जुदाई में जलेगा तेरी मिस्ल-ए-शम्अ' दिल मेरा
अगर की बत्तियाँ बन कर जलेंगी हड्डियाँ मेरी
सय्यद अनीसुद्दीन अहमद रीज़वी अमरोहवी
ग़ज़ल
नाम रौशन कर के क्यूँकर बुझ न जाता मिस्ल-ए-शम्अ'
ना-मुवाफ़िक़ थी ज़माने की हवा मेरे लिए