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ग़ज़ल
गुज़रें हमारे घर की किसी रहगुज़र से वो
पर्दे हटाएँ देखें उन्हें खिड़कियों से हम
आलोक श्रीवास्तव
ग़ज़ल
फ़क़ीह-ए-शहर को समझो कि हम पकड़े गए नाहक़
शराबें सब उसी की थीं बस इक पैमाना मेरा था
अर्श सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
हम जवानों को न छोड़ा उस से सब पकड़े गए
ये दो-साला दुख़्तर-ए-रज़ किस क़दर शत्ताह है
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
फ़ित्ना-अंगेज़ी भी छुपती है कहीं पर्दे में
सुनते हैं गब्र ओ मुसलमाँ से तिरे नाम को हम