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ग़ज़ल
पत्थर-दिल को मोम बनाया काफ़िर बुत को राम किया
काम तो आख़िर इतना तू ने आज दिल-ए-नाकाम किया
मुबारक मुंगेरी
ग़ज़ल
नज़र झुका के वो कहती थी मुझ को पत्थर दिल
मिलाती आँख तो आँखों में देखती आँसू
धीरेंद्र सिंह फ़य्याज़
ग़ज़ल
नसीहत रास कोई भी तुझे आती नहीं 'मोहसिन'
ज़माने भर में पत्थर-दिल कोई तुझ सा नहीं देखा