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ग़ज़ल
जो भरी दुनिया की संगीन अजाइब-नगरी में
अपना सर आप न फोड़े वो जहन्नम वासिल है
शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी
ग़ज़ल
न चिरे नोक से नश्तर के आयाज़म-बिल्लह
कोई उश्शाक़ के थे छाती के फोड़े पत्थर
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
ग़ज़ल
मैं उस को हर रोज़ बस यही एक झूट सुनने को फ़ोन करता
सुनो यहाँ कोई मसअला है तुम्हारी आवाज़ कट रही है