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ग़ज़ल
महफ़िल में शोर-ए-क़ुलक़ुल-ए-मीना-ए-मुल हुआ
ला साक़िया प्याला कि तौबा का क़ुल हुआ
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
ग़ज़ल
न गुल से काम है हम को न कुछ गुलज़ार से मतलब
ब-जाँ रखते हैं इक हमदम बदल इक यार से मतलब
मरदान सफ़ी
ग़ज़ल
बाग़ में जब कि वो दिल ख़ूँ-कुन-ए-हर-गुल पहुँचे
बिलबिलाती हुई गुलज़ार में बुलबुल पहुँचे
अब्दुल रहमान एहसान देहलवी
ग़ज़ल
कब तलक पीवेगा तू तर-दामनों से मिल के मुल
एक दम ऐ ग़ुंचा-लब हम से कभी तो खिल के खुल
हसरत अज़ीमाबादी
ग़ज़ल
अनल-हक़ जुज़्व-ए-ला-यंफक बना है मेरे ईक़ाँ का
यही है क़ुल-हुवल्लाहु-अहद मस्तों के क़ुरआँ का