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ग़ज़ल
जो शरफ़ हम को मिला कूचा-ए-जानाँ से 'फ़राज़'
सू-ए-मक़्तल भी गए हैं उसी पिंदार के साथ
अहमद फ़राज़
ग़ज़ल
तेरे मुहीत में कहीं गौहर-ए-ज़ि़ंदगी नहीं
ढूँड चुका मैं मौज मौज देख चुका सदफ़ सदफ़
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
ऐ 'शरफ़' कौन मिरे दिल के मुक़ाबिल होगा
इक यही सारी ख़ुदाई में है मर्दाना-ए-इश्क़
आग़ा हज्जू शरफ़
ग़ज़ल
एक दीवाने को इतना ही शरफ़ क्या कम है
ज़ुल्फ़ ओ ज़ंजीर से यक-गूना शग़फ़ क्या कम है
आल-ए-अहमद सुरूर
ग़ज़ल
ये क्या अंदाज़ है 'अशहर' शरीफ़ों से तख़ातुब का
शरफ़ बख़्शा न जाएगा किसी तक़रीब का तुझ को
इक़बाल अशहर कुरैशी
ग़ज़ल
त'अल्लुक़ ज़ेब-ओ-ज़ीनत से नहीं कुछ ख़ाकसारों को
'शरफ़' मिट्टी में रंगते हैं जो पैराहन बनाते हैं
आग़ा हज्जू शरफ़
ग़ज़ल
पयाम-ए-दोस्त हुआ क़ासिदों को वज्ह-ए-शरफ़
नसीम-ए-मिस्र से 'इज़्ज़त है कारवाँ के लिए