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ग़ज़ल
क्या मकाँ-ख़ुर्दा ख़लाइक़ में चले उस का ख़याल
तंग-हा-ए-शहर कुछ रस्ता निकाल उस के लिए
अख़्तर हुसैन जाफ़री
ग़ज़ल
नासिर अमरोहवी
ग़ज़ल
रियासत जब भी ढहती है नवासे दुख उठाते हैं
कहीं पंचर बनाते हैं कहीं तांगा चलाते हैं