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ग़ज़ल
बड़े लोगों के ऊँचे बद-नुमा और सर्द महलों को
ग़रीब आँखों से तकता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं
वसी शाह
ग़ज़ल
अर्पित शर्मा अर्पित
ग़ज़ल
क्या क्या हसीं थे जम्अ' परिस्ताँ का तख़्ता था
नज़रों में फिरते हैं रुख़-ए-ज़ेबा-ए-लखनऊ
वाजिद अली शाह अख़्तर
ग़ज़ल
अब किसे साहिल-ए-उम्मीद से तकता है 'फ़राज़'
वो जो इक कश्ती-ए-दिल थी उसे ग़र्क़ाब समझ
अहमद फ़राज़
ग़ज़ल
अब के शहर-ए-ज़िंदगी में सानेहा ऐसा हुआ
मैं सदा देता उसे वो मुझ को तकता रह गया
अख़्तर होशियारपुरी
ग़ज़ल
हैरत से तकता है सहरा बारिश के नज़राने को
कितनी दूर से आई है ये रेत से हाथ मिलाने को
सऊद उस्मानी
ग़ज़ल
जूँ पर-ए-ताऊस जौहर तख़्ता मश्क़-ए-रंग है
बस-कि है वो क़िबला-ए-आईना महव-ए-इख़तिराअ'
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
ज़ाहिर है हम से कुल्फ़त-ए-बख़्त-ए-सियाह-रोज़
गोया कि तख़्ता-ए-मश्क़ हैं ख़त-ए-ग़ुबार के
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
रोज़ छुप के तकता है प्यासी प्यासी नज़रों से
उस के घर के आगे से दरिया जब गुज़रता है