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ग़ज़ल
लज़्ज़त-ए-जाम-ए-जम कभी तल्ख़ी-ए-ज़हर-ए-ग़म कभी
इशरत-ए-ज़ीस्त है 'असर' गर्दिश-ए-इंक़िलाब में
असर सहबाई
ग़ज़ल
पी चुके थे ज़हर-ए-ग़म ख़स्ता-जाँ पड़े थे हम चैन था
फिर किसी तमन्ना ने साँप की तरह हम को डस लिया
राजेन्द्र मनचंदा बानी
ग़ज़ल
है ये इब्तिदा ग़म-ए-इश्क़ की अभी ज़हर-ए-ग़म पिया जाएगा
कभी चाक होगा ये पैरहन कभी पैरहन सिया जाएगा
शाहिदा सदफ
ग़ज़ल
ज़हर-ए-चश्म-ए-साक़ी में कुछ अजीब मस्ती है
ग़र्क़ कुफ़्र ओ ईमाँ हैं दौर-ए-मय-परस्ती है