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ग़ज़ल
अमीर ख़ुसरो
ग़ज़ल
फ़िक्र-ए-नाला में गोया हल्क़ा हूँ ज़े-सर-ता-पा
उज़्व उज़्व जूँ ज़ंजीर यक-दिल-ए-सदा पाया
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
ये ग़ज़ल अपनी मुझे जी से पसंद आती है आप
है रदीफ़-ए-शेर में 'ग़ालिब' ज़ि-बस तकरार-ए-दोस्त
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
'मोमिन' वही ग़ज़ल पढ़ो शब जिस से बज़्म में
आती थी लब पे जान ज़ह-ओ-हब्बज़ा के साथ
मोमिन ख़ाँ मोमिन
ग़ज़ल
'जिगर' वो भी ज़े-सर-ता-पा मोहब्बत ही मोहब्बत हैं
मगर उन की मोहब्बत साफ़ पहचानी नहीं जाती
जिगर मुरादाबादी
ग़ज़ल
मैं ज़-ख़ुद रफ़्ता हुआ सुनते ही जाने की ख़बर
पहले मैं आप में आ लूँ तो चले जाइएगा
बेदम शाह वारसी
ग़ज़ल
गुम हो के हर जगह हैं ज़-ख़ुद रफ़्तगान-ए-इश्क़
उन की भी अहल-ए-कश्फ़-ओ-करामात ज़ात है
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
ज़ि-बस आतिश ने फ़स्ल-ए-रंग में रंग-ए-दिगर पाया
चराग़-ए-गुल से ढूँढे है चमन में शम्अ' ख़ार अपना
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
बिस कि हैरत से ज़ि-पा उफ़्तादा-ए-ज़िन्हार है
नाख़ुन-ए-अंगुश्त-ए-बुत ख़ाल-ए-लब-ए-बीमार है
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
हिर फिर के उन की आँख 'अदू से लड़े न क्यूँ
फ़ित्ना को करती है निगह-ए-फ़ित्ना-ज़ा पसंद