aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम ",I4u"
क्यूँ ज़ियाँ-कार बनूँ सूद-फ़रामोश रहूँफ़िक्र-ए-फ़र्दा न करूँ महव-ए-ग़म-ए-दोश रहूँनाले बुलबुल के सुनूँ और हमा-तन गोश रहूँहम-नवा मैं भी कोई गुल हूँ कि ख़ामोश रहूँजुरअत-आमोज़ मिरी ताब-ए-सुख़न है मुझ कोशिकवा अल्लाह से ख़ाकम-ब-दहन है मुझ कोहै बजा शेवा-ए-तस्लीम में मशहूर हैं हमक़िस्सा-ए-दर्द सुनाते हैं कि मजबूर हैं हमसाज़ ख़ामोश हैं फ़रियाद से मामूर हैं हमनाला आता है अगर लब पे तो मा'ज़ूर हैं हमऐ ख़ुदा शिकवा-ए-अर्बाब-ए-वफ़ा भी सुन लेख़ूगर-ए-हम्द से थोड़ा सा गिला भी सुन लेथी तो मौजूद अज़ल से ही तिरी ज़ात-ए-क़दीमफूल था ज़ेब-ए-चमन पर न परेशाँ थी शमीमशर्त इंसाफ़ है ऐ साहिब-ए-अल्ताफ़-ए-अमीमबू-ए-गुल फैलती किस तरह जो होती न नसीमहम को जमईयत-ए-ख़ातिर ये परेशानी थीवर्ना उम्मत तिरे महबूब की दीवानी थीहम से पहले था अजब तेरे जहाँ का मंज़रकहीं मस्जूद थे पत्थर कहीं मा'बूद शजरख़ूगर-ए-पैकर-ए-महसूस थी इंसाँ की नज़रमानता फिर कोई अन-देखे ख़ुदा को क्यूँकरतुझ को मालूम है लेता था कोई नाम तिराक़ुव्वत-ए-बाज़ू-ए-मुस्लिम ने किया काम तिराबस रहे थे यहीं सल्जूक़ भी तूरानी भीअहल-ए-चीं चीन में ईरान में सासानी भीइसी मामूरे में आबाद थे यूनानी भीइसी दुनिया में यहूदी भी थे नसरानी भीपर तिरे नाम पे तलवार उठाई किस नेबात जो बिगड़ी हुई थी वो बनाई किस नेथे हमीं एक तिरे मारका-आराओं मेंख़ुश्कियों में कभी लड़ते कभी दरियाओं मेंदीं अज़ानें कभी यूरोप के कलीसाओं मेंकभी अफ़्रीक़ा के तपते हुए सहराओं मेंशान आँखों में न जचती थी जहाँ-दारों कीकलमा पढ़ते थे हमीं छाँव में तलवारों कीहम जो जीते थे तो जंगों की मुसीबत के लिएऔर मरते थे तिरे नाम की अज़्मत के लिएथी न कुछ तेग़ज़नी अपनी हुकूमत के लिएसर-ब-कफ़ फिरते थे क्या दहर में दौलत के लिएक़ौम अपनी जो ज़र-ओ-माल-ए-जहाँ पर मरतीबुत-फ़रोशीं के एवज़ बुत-शिकनी क्यूँ करतीटल न सकते थे अगर जंग में अड़ जाते थेपाँव शेरों के भी मैदाँ से उखड़ जाते थेतुझ से सरकश हुआ कोई तो बिगड़ जाते थेतेग़ क्या चीज़ है हम तोप से लड़ जाते थेनक़्श-ए-तौहीद का हर दिल पे बिठाया हम नेज़ेर-ए-ख़ंजर भी ये पैग़ाम सुनाया हम नेतू ही कह दे कि उखाड़ा दर-ए-ख़ैबर किस नेशहर क़ैसर का जो था उस को किया सर किस नेतोड़े मख़्लूक़ ख़ुदावंदों के पैकर किस नेकाट कर रख दिए कुफ़्फ़ार के लश्कर किस नेकिस ने ठंडा किया आतिश-कदा-ए-ईराँ कोकिस ने फिर ज़िंदा किया तज़्किरा-ए-यज़्दाँ कोकौन सी क़ौम फ़क़त तेरी तलबगार हुईऔर तेरे लिए ज़हमत-कश-ए-पैकार हुईकिस की शमशीर जहाँगीर जहाँ-दार हुईकिस की तकबीर से दुनिया तिरी बेदार हुईकिस की हैबत से सनम सहमे हुए रहते थेमुँह के बल गिर के हू-अल्लाहू-अहद कहते थेआ गया ऐन लड़ाई में अगर वक़्त-ए-नमाज़क़िबला-रू हो के ज़मीं-बोस हुई क़ौम-ए-हिजाज़एक ही सफ़ में खड़े हो गए महमूद ओ अयाज़न कोई बंदा रहा और न कोई बंदा-नवाज़बंदा ओ साहब ओ मोहताज ओ ग़नी एक हुएतेरी सरकार में पहुँचे तो सभी एक हुएमहफ़िल-ए-कौन-ओ-मकाँ में सहर ओ शाम फिरेमय-ए-तौहीद को ले कर सिफ़त-ए-जाम फिरेकोह में दश्त में ले कर तिरा पैग़ाम फिरेऔर मालूम है तुझ को कभी नाकाम फिरेदश्त तो दश्त हैं दरिया भी न छोड़े हम नेबहर-ए-ज़ुल्मात में दौड़ा दिए घोड़े हम नेसफ़्हा-ए-दहर से बातिल को मिटाया हम नेनौ-ए-इंसाँ को ग़ुलामी से छुड़ाया हम नेतेरे का'बे को जबीनों से बसाया हम नेतेरे क़ुरआन को सीनों से लगाया हम नेफिर भी हम से ये गिला है कि वफ़ादार नहींहम वफ़ादार नहीं तू भी तो दिलदार नहींउम्मतें और भी हैं उन में गुनहगार भी हैंइज्ज़ वाले भी हैं मस्त-ए-मय-ए-पिंदार भी हैंउन में काहिल भी हैं ग़ाफ़िल भी हैं हुश्यार भी हैंसैकड़ों हैं कि तिरे नाम से बे-ज़ार भी हैंरहमतें हैं तिरी अग़्यार के काशानों परबर्क़ गिरती है तो बेचारे मुसलमानों परबुत सनम-ख़ानों में कहते हैं मुसलमान गएहै ख़ुशी उन को कि का'बे के निगहबान गएमंज़िल-ए-दहर से ऊँटों के हुदी-ख़्वान गएअपनी बग़लों में दबाए हुए क़ुरआन गएख़ंदा-ज़न कुफ़्र है एहसास तुझे है कि नहींअपनी तौहीद का कुछ पास तुझे है कि नहींये शिकायत नहीं हैं उन के ख़ज़ाने मामूरनहीं महफ़िल में जिन्हें बात भी करने का शुऊ'रक़हर तो ये है कि काफ़िर को मिलें हूर ओ क़ुसूरऔर बेचारे मुसलमाँ को फ़क़त वादा-ए-हूरअब वो अल्ताफ़ नहीं हम पे इनायात नहींबात ये क्या है कि पहली सी मुदारात नहींक्यूँ मुसलमानों में है दौलत-ए-दुनिया नायाबतेरी क़ुदरत तो है वो जिस की न हद है न हिसाबतू जो चाहे तो उठे सीना-ए-सहरा से हबाबरह-रव-ए-दश्त हो सैली-ज़दा-ए-मौज-ए-सराबतान-ए-अग़्यार है रुस्वाई है नादारी हैक्या तिरे नाम पे मरने का एवज़ ख़्वारी हैबनी अग़्यार की अब चाहने वाली दुनियारह गई अपने लिए एक ख़याली दुनियाहम तो रुख़्सत हुए औरों ने सँभाली दुनियाफिर न कहना हुई तौहीद से ख़ाली दुनियाहम तो जीते हैं कि दुनिया में तिरा नाम रहेकहीं मुमकिन है कि साक़ी न रहे जाम रहेतेरी महफ़िल भी गई चाहने वाले भी गएशब की आहें भी गईं सुब्ह के नाले भी गएदिल तुझे दे भी गए अपना सिला ले भी गएआ के बैठे भी न थे और निकाले भी गएआए उश्शाक़ गए वादा-ए-फ़र्दा ले करअब उन्हें ढूँड चराग़-ए-रुख़-ए-ज़ेबा ले करदर्द-ए-लैला भी वही क़ैस का पहलू भी वहीनज्द के दश्त ओ जबल में रम-ए-आहू भी वहीइश्क़ का दिल भी वही हुस्न का जादू भी वहीउम्मत-ए-अहमद-ए-मुर्सिल भी वही तू भी वहीफिर ये आज़ुर्दगी-ए-ग़ैर सबब क्या मा'नीअपने शैदाओं पे ये चश्म-ए-ग़ज़ब क्या मा'नीतुझ को छोड़ा कि रसूल-ए-अरबी को छोड़ाबुत-गरी पेशा किया बुत-शिकनी को छोड़ाइश्क़ को इश्क़ की आशुफ़्ता-सरी को छोड़ारस्म-ए-सलमान ओ उवैस-ए-क़रनी को छोड़ाआग तकबीर की सीनों में दबी रखते हैंज़िंदगी मिस्ल-ए-बिलाल-ए-हबशी रखते हैंइश्क़ की ख़ैर वो पहली सी अदा भी न सहीजादा-पैमाई-ए-तस्लीम-ओ-रज़ा भी न सहीमुज़्तरिब दिल सिफ़त-ए-क़िबला-नुमा भी न सहीऔर पाबंदी-ए-आईन-ए-वफ़ा भी न सहीकभी हम से कभी ग़ैरों से शनासाई हैबात कहने की नहीं तू भी तो हरजाई हैसर-ए-फ़ाराँ पे किया दीन को कामिल तू नेइक इशारे में हज़ारों के लिए दिल तू नेआतिश-अंदोज़ किया इश्क़ का हासिल तू नेफूँक दी गर्मी-ए-रुख़्सार से महफ़िल तू नेआज क्यूँ सीने हमारे शरर-आबाद नहींहम वही सोख़्ता-सामाँ हैं तुझे याद नहींवादी-ए-नज्द में वो शोर-ए-सलासिल न रहाक़ैस दीवाना-ए-नज़्ज़ारा-ए-महमिल न रहाहौसले वो न रहे हम न रहे दिल न रहाघर ये उजड़ा है कि तू रौनक़-ए-महफ़िल न रहाऐ ख़ुशा आँ रोज़ कि आई ओ ब-सद नाज़ आईबे-हिजाबाना सू-ए-महफ़िल-ए-मा बाज़ आईबादा-कश ग़ैर हैं गुलशन में लब-ए-जू बैठेसुनते हैं जाम-ब-कफ़ नग़्मा-ए-कू-कू बैठेदौर हंगामा-ए-गुलज़ार से यकसू बैठेतेरे दीवाने भी हैं मुंतज़िर-ए-हू बैठेअपने परवानों को फिर ज़ौक़-ए-ख़ुद-अफ़रोज़ी देबर्क़-ए-देरीना को फ़रमान-ए-जिगर-सोज़ी देक़ौम-ए-आवारा इनाँ-ताब है फिर सू-ए-हिजाज़ले उड़ा बुलबुल-ए-बे-पर को मज़ाक़-ए-परवाज़मुज़्तरिब-बाग़ के हर ग़ुंचे में है बू-ए-नियाज़तू ज़रा छेड़ तो दे तिश्ना-ए-मिज़राब है साज़नग़्मे बेताब हैं तारों से निकलने के लिएतूर मुज़्तर है उसी आग में जलने के लिएमुश्किलें उम्मत-ए-मरहूम की आसाँ कर देमोर-ए-बे-माया को हम-दोश-ए-सुलेमाँ कर देजिंस-ए-नायाब-ए-मोहब्बत को फिर अर्ज़ां कर देहिन्द के दैर-नशीनों को मुसलमाँ कर देजू-ए-ख़ूँ मी चकद अज़ हसरत-ए-दैरीना-ए-मामी तपद नाला ब-निश्तर कद-ए-सीना-ए-माबू-ए-गुल ले गई बैरून-ए-चमन राज़-ए-चमनक्या क़यामत है कि ख़ुद फूल हैं ग़म्माज़-ए-चमनअहद-ए-गुल ख़त्म हुआ टूट गया साज़-ए-चमनउड़ गए डालियों से ज़मज़मा-पर्दाज़-ए-चमनएक बुलबुल है कि महव-ए-तरन्नुम अब तकउस के सीने में है नग़्मों का तलातुम अब तकक़ुमरियाँ शाख़-ए-सनोबर से गुरेज़ाँ भी हुईंपत्तियाँ फूल की झड़ झड़ के परेशाँ भी हुईंवो पुरानी रौशें बाग़ की वीराँ भी हुईंडालियाँ पैरहन-ए-बर्ग से उर्यां भी हुईंक़ैद-ए-मौसम से तबीअत रही आज़ाद उस कीकाश गुलशन में समझता कोई फ़रियाद उस कीलुत्फ़ मरने में है बाक़ी न मज़ा जीने मेंकुछ मज़ा है तो यही ख़ून-ए-जिगर पीने मेंकितने बेताब हैं जौहर मिरे आईने मेंकिस क़दर जल्वे तड़पते हैं मिरे सीने मेंइस गुलिस्ताँ में मगर देखने वाले ही नहींदाग़ जो सीने में रखते हों वो लाले ही नहींचाक इस बुलबुल-ए-तन्हा की नवा से दिल होंजागने वाले इसी बाँग-ए-दरा से दिल होंया'नी फिर ज़िंदा नए अहद-ए-वफ़ा से दिल होंफिर इसी बादा-ए-दैरीना के प्यासे दिल होंअजमी ख़ुम है तो क्या मय तो हिजाज़ी है मिरीनग़्मा हिन्दी है तो क्या लय तो हिजाज़ी है मिरी
है शायद दिल मिरा बे-ज़ख़्म और लब पर नहीं छालेमिरे सीने में कब सोज़िंदा-तर दाग़ों के हैं थालेमगर दोज़ख़ पिघल जाए जो मेरे साँस अपना लेतुम अपनी माम के बेहद मुरादी मिन्नतों वालेमिरे कुछ भी नहीं कुछ भी नहीं कुछ भी नहीं बालेमगर पहले कभी तुम से मिरा कुछ सिलसिला तो थागुमाँ में मेरे शायद इक कोई ग़ुंचा खिला तो थावो मेरी जावेदाना बे-दुई का इक सिला तो थासो उस को एक अब्बू नाम का घोड़ा मिला तो था
सो ये जवाब है मेरा मिरे अदू के लिएकि मुझ को हिर्स-ए-करम है न ख़ौफ़-ए-ख़म्याज़ाउसे है सतवत-ए-शमशीर पर घमंड बहुतउसे शिकोह-ए-क़लम का नहीं है अंदाज़ा
सितम तो ये है कि दोनों के मर्ग़-ज़ारों सेहवा-ए-फ़ित्ना ओ बू-ए-फ़साद आती हैअलम तो ये है कि दोनों को वहम है कि बहारअदू के ख़ूँ में नहाने के बा'द आती है
क्यूँ लम्बे बाल हैं भालू केक्यूँ उस की टुंड कराई नहींक्या वो भी गंदा बच्चा हैया उस के अब्बू भाई नहींये उस का हेयर स्टाइल हैया जंगल में कोई नाई नहीं
क्यूँ त'अज्जुब है मिरी सहरा-नवर्दी पर तुझेये तगा-पू-ए-दमादम ज़िंदगी की है दलीलऐ रहीन-ए-ख़ाना तू ने वो समाँ देखा नहींगूँजती है जब फ़ज़ा-ए-दश्त में बाँग-ए-रहीलरेत के टीले पे वो आहू का बे-परवा ख़िरामवो हज़र बे-बर्ग-ओ-सामाँ वो सफ़र बे-संग-ओ-मीलवो नुमूद-ए-अख़्तर-ए-सीमाब-पा हंगाम-ए-सुब्हया नुमायाँ बाम-ए-गर्दूं से जबीन-ए-जिब्रईलवो सुकूत-ए-शाम-ए-सहरा में ग़ुरूब-ए-आफ़्ताबजस से रौशन-तर हुई चश्म-ए-जहाँ-बीन-ए-ख़लीलऔर वो पानी के चश्मे पर मक़ाम-ए-कारवाँअहल-ए-ईमाँ जस तरह जन्नत में गिर्द-ए-सलसबीलताज़ा वीराने की सौदा-ए-मोहब्बत को तलाशऔर आबादी में तू ज़ंजीरी-ए-किश्त-ओ-नख़ीलपुख़्ता-तर है गर्दिश-ए-पैहम से जाम-ए-ज़िंदगीहै यही ऐ बे-ख़बर राज़-ए-दवाम-ए-ज़िंदगी
ये बच्चा किस का बच्चा हैये बच्चा कैसा बच्चा हैजो रेत पे तन्हा बैठा हैना इस के पेट में रोटी हैना इस के तन पर कपड़ा हैना इस के सर पर टोपी हैना इस के पैर में जूता हैना इस के पास खिलौनों मेंकोई भालू है, कोई घोड़ा हैना इस का जी बहलाने कोकोई लोरी है, कोई झूला हैना इस की जेब में धेला हैना इस के हाथ में पैसा हैना इस के अम्मी अब्बू हैंना इस की आपा ख़ाला है
हाँ किस के लिए सब उस के लिएवो जिस के लब पर टेसू हैंवो जिस के नैनाँ आहू हैंजो ख़ार भी है और ख़ुश्बू भीजो दर्द भी है और दारू भीवो अल्लहड़ सी वो चंचल सीवो शायर सी वो पागल सीलोग आप-ही-आप समझ जाएँहम नाम न उस का बतलाएँऐ देखने वालो तुम ने भीउस नार की पीत की आँचों मेंइस दिल का तीना देखा है?कल हम ने सपना देखा है
सर पे अपने जूड़ा बाँधेमाँझी की उम्मीद लगाएभीगी उजली सुब्ह में तुमकोहरे की चादर में लिपटीनदी किनारे सोच में गुमताज-महल सी लगती हो
आहू माँगे बन का रमनाभँवरा चाहे फूल की डालीसूखे खेत की कोंपल माँगेइक घनघोर बदरिया कालीधूप जले कहीं साया चाहेंअंधी रातें दीप दिवालीहम क्या माँगें हम क्या चाहेंहोंट सिले और झोली ख़ालीदिल भँवरा न फूल न कोंपलबगिया ना बगिया का मालीदिल आहू न धूप न सायादिल की अपनी बात निरालीदिल तो किसी दर्शन का भूकादिल तो किसी दर्शन का सवालीनाम लिए बिन पड़ा पुकारेकिसे पुकारे दश्त किनारे
ऐ देखने वालोइस हुस्न को देखोइस राज़ को समझोये नक़्श-ए-ख़यालीये फ़िक्रत-ए-आलीये पैकर-ए-तनवीरये कृष्ण की तस्वीरमअनी है कि सूरतसनअ'त है कि फ़ितरतज़ाहिर है कि मस्तूरनज़दीक है या दूरये नार है या नूरदुनिया से निरालाये बाँसुरी वालागोकुल का ग्वालाहै सेहर कि एजाज़खुलता ही नहीं राज़क्या शान है वल्लाहक्या आन है वल्लाहहैरान हूँ क्या हैइक शान-ए-ख़ुदा हैबुत-ख़ाने के अंदरख़ुद हुस्न का बुत-गरबुत बन गया आ करवो तुर्फ़ा नज़्ज़ारेयाद आ गए सारेजमुना के किनारेसब्ज़े का लहकनाफूलों का महकनाघनघोर घटाएँसरमस्त हवाएँमासूम उमंगेंउल्फ़त की तरंगेंवो गोपियों के साथहाथों में दिए हाथरक़्साँ हुआ ब्रिजनाथबंसी में जो लय हैनश्शा है न मय हैकुछ और ही शय हैइक रूह है रक़्साँइक कैफ़ है लर्ज़ांएक अक़्ल है मय-नोशइक होश है मदहोशइक ख़ंदा है सय्यालइक गिर्या है ख़ुश-हालइक इश्क़ है मग़रूरइक हुस्न है मजबूरइक सेहर है मसहूरदरबार में तन्हालाचार है कृष्णाआ श्याम इधर आसब अहल-ए-ख़ुसूमतहैं दर पए इज़्ज़तये राज दुलारेबुज़दिल हुए सारेपर्दा न हो ताराजबेकस की रहे लाजआ जा मेरे कालेभारत के उजालेदामन में छुपा लेवो हो गई अन-बनवो गर्म हुआ रनग़ालिब है दुर्योधनवो आ गए जगदीशवो मिट गई तशवीशअर्जुन को बुलायाउपदेश सुनायाग़म-ज़ाद का ग़म क्याउस्ताद का ग़म क्यालो हो गई तदबीरलो बन गई तक़दीरलो चल गई शमशीरसीरत है अदू-सोज़सूरत नज़र-अफ़रोज़दिल कैफ़ियत-अंदोज़ग़ुस्से में जो आ जाएबिजली ही गिरा जाएऔर लुत्फ़ पर आएतो घर भी लुटा जाएपरियों में है गुलफ़ामराधा के लिए श्यामबलराम का भय्यामथुरा का बसय्याबिंद्रा में कन्हैय्याबन हो गए वीराँबर्बाद गुलिस्ताँसखियाँ हैं परेशाँजमुना का किनारासुनसान है सारातूफ़ान हैं ख़ामोशमौजों में नहीं जोशलौ तुझ से लगी हैहसरत ही यही हैऐ हिन्द के राजाइक बार फिर आ जादुख दर्द मिटा जाअब्र और हवा सेबुलबुल की सदा सेफूलों की ज़िया सेजादू-असरी गुमशोरीदा-सरी गुमहाँ तेरी जुदाईमथुरा को न भाईतू आए तो शान आएतू आए तो जान आएआना न अकेलेहों साथ वो मेलेसखियों के झमेले
अहल-ए-दौलत का सुन चुके तुम हालअब सुनो रुएदाद-ए-अहल-ए-कमालफ़ाज़िलों को है फ़ाज़िलों से इनादपंडितों में पड़े हुए हैं फ़सादहै तबीबों में नोक-झोक सदाएक से एक का है थूक जुदारहने दो अह-ए-इल्म हैं इस तरहपहलवानों में लाग हो जिस तरहईदू वालों का है अगर पट्ठाशेख़ू वालों में जा नहीं सकताशाइरों में भी है यही तकरारख़ुशनवेशों को है यही आज़ारलाख नेकों का क्यूँ न हो इक नेकदेख सकता नहीं है एक को एकइस पे तुर्रा ये है कि अहल-ए-हुनरदूर समझे हुए हैं अपना घरमिली इक गाँठ जिस को हल्दी कीउस ने समझा कि मैं हूँ पंसारीनुस्ख़ा इक तिब का जिस को आता हैसगे-भाई से वो छुपाता हैजिस को आता है फूँकना कुश्ताहै हमारी तरफ़ से वो गूँगाजिस को है कुछ रमल में मालूमातवो नहीं करता सीधे मुँह से बातबाप भाई हो या कि हो बेटाभेद पाता नहीं मुनज्जम काकाम कंदले का जिस को है मालूमहै ज़माने में उस की बुख़्ल की धूमअल-ग़रज़ जिस के पास है कुछ चीज़जान से भी सिवा है उस को अज़ीज़क़ौम पर उन का कुछ नहीं एहसाँउन का होना न होना है यकसाँसब कमालात और हुनर उन केक़ब्र में उन के साथ जाएँगेक़ौम क्या कह के उन को रोएगीनाम पर क्यूँ कि जान खोएगीतरबियत-याफ़्ता हैं जो याँ केख़्वाह बी-ए हों इस में या एम-एभरते हुब्ब-ए-वतन का गो दम हैंपर मुहिब्ब-ए-वतन बहुत कम हैंक़ौम को उन से जो उमीदें थींअब जो देखा तो सब ग़लत निकलींहिस्ट्री उन की और जियोग्राफीसात पर्दे में मुँह दिए है पड़ीबंद उस क़ुफ़्ल में है इल्म उन काजिस की कुंजी का कुछ नहीं है पतालेते हैं अपने दिल ही दिल में मज़ेगोया गूँगे का गुड़ हैं खाए हुएकरते फिरते हैं सैर-ए-गुल तन्हाकोई पास उन के जा नहीं सकताअहल-ए-इंसाफ़ शर्म की जा हैगर नहीं बुख़्ल ये तो फिर क्या हैतुम ने देखा है जो वो सब को दिखाओतुम ने चखा है जो वो सब को चखाओये जो दौलत तुम्हारे पास है आजहम-वतन इस के हैं बहुत मोहताजमुँह को एक इक तुम्हारे है तकताकि निकलता है मुँह से आप के क्याआप शाइस्ता हैं तो अपने लिएकुछ सुलूक अपनी क़ौम से भी किएमेज़ कुर्सी अगर लगाते हैं आपक़ौम से पूछिए तो पुन है न पापमुँडा जूता गर आप को है पसंदक़ौम को इस से फ़ाएदा न गज़ंदक़ौम पर करते हो अगर एहसाँतो दिखाओ कुछ अपना जोश-ए-निहाँकुछ दिनों ऐश में ख़लल डालोपेट में जो है सब उगल डालोइल्म को कर दो कू-ब-कू अर्ज़ांहिन्द को कर दिखाओ इंगलिस्ताँ
सुलैमाँ सर-ब-ज़ानू और सबा वीराँसबा वीराँ, सबा आसेब का मस्कनसबा आलाम का अम्बार-ए-बे-पायाँ!गयाह ओ सब्ज़ा ओ गुल से जहाँ ख़ालीहवाएँ तिश्ना-ए-बाराँ,तुयूर इस दश्त के मिनक़ार-ए-ज़ेर-ए-परतू सुर्मा वर गुलू इंसाँसुलैमाँ सर-ब-ज़ानू और सबा वीराँ!सुलैमाँ सर-ब-ज़ानू तुर्श-रू ग़म-गीं, परेशाँ-मूजहाँ-गिरी, जहाँ-बानी फ़क़त तर्रार-ए-आहूमोहब्बत शोला-ए-पराँ हवस बू-ए-गुल बे-बूज़-राज़-ए-दहर कम-तर-गो!सबा वीराँ के अब तक इस ज़मीं पर हैंकिसी अय्यार के ग़ारत-गरों के नक़्श-ए-पा बाक़ीसबा बाक़ी, न महरू-ए-सबा बाक़ी!सुलैमाँ सर-ब-ज़ानूअब कहाँ से क़ासिद-ए-फ़र्ख़ंदा-पय आए?कहाँ से, किस सुबू से कास-ए-पीरी में मय आए?
छोटी सी बिल्लूछोटा सा बस्ताठूँसा है जिस मेंकाग़ज़ का दस्तालकड़ी का घोड़ारुई का भालूचूरन की शीशीआलू कचालूबिल्लू का बस्ताजिन की पिटारीजब इस को देखोपहले से भारीलट्टू भी इस मेंरस्सी भी इस मेंडंडा भी इस मेंगिल्ली भी इस मेंऐ प्यारी बिल्लूये तो बताओक्या काम करनेइस्कूल जाओउर्दू न जानोइंग्लिश न जानोकहती हो ख़ुद कोबिल्क़ीस बानोउम्र की इतनीकच्ची नहीं होछे साल की होबच्ची नहीं होबाहर निकालोलकड़ी का घोड़ाये लट्टू रस्सीये गिल्ली डंडागुड़िया के जूतेजंपर जुराबेंबस्ते में रक्खोअपनी किताबेंमुँह न बनाओइस्कूल जाओऐ प्यारी बिल्लूऐ प्यारी बिल्लू
काले कोस ग़म-ए-उल्फ़त के और मैं नान-ए-शबीना-जूकभी चमन-ज़ारों में उलझा और कभी गंदुम की बूनाफ़ा-ए-मुश्क-ए-ततारी बन कर लिए फिरी मुझ को हर-सूयही हयात-ए-साइक़ा-फ़ितरत बनी तअत्तुल कभी नुमूकभी किया रम इश्क़ से ऐसे जैसे कोई वहशी आहूऔर कभी मर-मर के सहर की इस आबाद ख़राबे मेंदेखो हम कैसे बसर की इस आबाद ख़राबे में
लम्बे वक़्त से सोच रहा हूँजाने क्यूँ ऐसा हूँ मैंमिलने से घबराता हूँ मैं झूट नहीं कह पाता हूँउस के शिकवे उस की शिकायत झगड़े से डर जाता हूँइधर-उधर की बातें मुझ को ज़रा न ख़ुश कर पाती हैंजाने क्यूँ ऐसा हूँ मैंदोस्त नहीं बन पाते मेरेरिश्ते नहीं सँभलते हैंबेजा मोहब्बत बेजा तकल्लुफ़दोनों ओछे लगते हैंऔरों की कमियों को बिल्कुलअच्छा नहीं कह पाता हूँजाने क्यूँ ऐसा हूँ मैंअच्छे भले कामों में अक्सरदेर बहुत कर देता हूँअम्मी से बातें करनी हूँ बेटी के स्कूल हो जानाकोई नया नॉवेल पढ़ना हो कोई कहानी लिखनी होसब को टालता रहता हूँजाने क्यूँ ऐसा हूँ मैंभीड़ भरे शहरों से मुझ कोवहशत सी हो जाती हैगाँव जंगल सुनसान जगहेंअक्सर ख़ुश आ जाती हैंकोई अल्हड़ चेहरा देखूँ मन को वो भा जाता हैजाने क्यूँ ऐसा हूँ मैंपेड़ों के पैराहन देखूँ फूलों की ख़ुश्बू को सूंघूँरंग-बिरंगी तितलियाँ पकड़ूँ हल्की हल्की बूँदें भीठंडी नरम हवाएँ जब जब चुपके से छू जाती हैंया कोयल की बोली सुन लूँ मन ब्याकुल हो जाता हैजाने क्यूँ ऐसा हूँ मैंनट बंजारन सन्यासी और खेल-तमाशे वाले लोगखंडर वीराना जलती धूप फूली सरसों धान के खेतलाल पतंग और पीली मैना इन्द्र-धनुष और नदी की धारआते हैं जब ख़्वाब में मेरे दीवाना हो जाता हूँजाने क्यूँ ऐसा हूँ मैंबहुत मुझे अच्छा कहते हैं बुरा भी कोई कहता हैसामने मेरी मदह-सराई पीछे गाली देता हैहमदर्दी है कोई दिखाता कोई साज़िश करता हैफिर भी चुप चुप सा रहता हूँ जैसे बहुत अंजान हूँ मैंजाने क्यूँ ऐसा हूँ मैंथोड़ी सी आज़ादी मुझ को थोड़ा बहुत वक़्त का ज़ियाँकभी कभार की अच्छी बातें किसी किसी का सच्चा प्यारछोटी-मोटी कोई शरारत खिलखिला कर हँसना भीये सब ख़ुश कर जाते हैं जब तोलगता है कि ज़िंदा हूँजाने क्यूँ ऐसा हूँ मैं
ख़ाकिस्तर-ए-दिल को है फिर शोला-ब-जाँ होनाहैरत का जहाँ होना हसरत का निशाँ होनाऐ शख़्स जो तू आकर यूँ दिल में समाया हैतू दर्द कि दरमाँ है तो धूप कि साया है?नैनाँ तिरे जादू हैं गेसू तिरे ख़ुश्बू हैंबातें किसी जंगल में भटका हुआ आहू हैंमक़्सूद-ए-वफ़ा सुन ले क्या साफ़ है सादा हैजीने की तमन्ना है मरने का इरादा है
ऐ जहाँ देख ले कब से बे-घर हैं हमअब निकल आए हैं ले के अपना अलमये महल्लात ये ऊँचे ऊँचे मकाँइन की बुनियाद में है हमारा लहूकल जो मेहमान थे घर के मालिक बनेशाह भी है अदू शैख़ भी है अदूकब तलक हम सहें ग़ासिबों के सितमऐ जहाँ देख ले कब से बे-घर हैं हमअब निकल आए हैं ले के अपना अलम
ऐ अलीगढ़ ऐ जवाँ-क़िस्मत दबिस्तान-ए-कुहनअक़्ल के फ़ानूस से रौशन है तेरी अंजुमनहश्र के दिन तक फला-फूला रहे तेरा चमनतेरे पैमानों में लर्ज़ां है शराब-ए-इल्म-ओ-फ़नरूह-ए-'सर-सय्यद' से रौशन तेरा मय-ख़ाना रहेरहती दुनिया तक तिरा गर्दिश में पैमाना रहेएक दिन हम भी तिरी आँखों के बीमारों में थेतेरी ज़ुल्फ़-ए-ख़म नजम के नौ-गिरफ़्तारों में थेतेरी जिंस-ए-इल्म-परवर के ख़रीदारों में थेजान-ओ-दिल से तेरे जल्वों के परस्तारों में थेमौज-ए-कौसर था तिरा सैल-ए-अदा अपने लिएआब-ए-हैवाँ थी तेरी आब-ओ-हवा अपने लिएइल्म का पहला सबक़ तू ने पढ़ाया था हमेंकिस तरह जीते हैं तू ने ही बताया था हमेंख़्वाब से तिफ़्ली के तू ने ही जगाया था हमेंनाज़ से परवान तू ने ही चढ़ाया था हमेंमौसम-ए-गुल की ख़बर तेरी ज़बानी आई थीतेरे बाग़ों में हवा खा कर जवानी आई थीलेकिन ऐ इल्म-ओ-जसारत के दरख़्शाँ आफ़्ताबकुछ ब-अल्फ़ाज़-ए-दिगर भी तुझ से करना है ख़िताबगो ये धड़का है कि हूँगा मूरिद-ए-क़हर-ओ-इताबकह भी दूँ जो कुछ है दिल में ता-कुजा ये पेच-ओ-ताबबन पड़े जो सई अपने से वो करना चाहिएमर्द को कहने के मौक़ा पे न डरना चाहिएऐ अलीगढ़ ऐ हलाक-ए-ताबिश-ए-वज़्अ-ए-फ़रंग'टेम्स' है आग़ोश में तेरे बजाए मौज-ए-गंगवादी-ए-मग़रिब में गुम है तेरे दिल की हर उमंगवलवलों में तेरे शायद अर्सा-ए-मशरिक़ है तंगकब है मग़रिब काबा-ए-हाजत-रवा तेरे लिएआ कि है बेचैन रूह-ए-एशिया तेरे लिएकुश्ता-ए-मग़रिब निगार-ए-शर्क़ के अबरू भी देखसाज़-ए-बे-रंगी के जूया सोज़-ए-रंग-ओ-बू भी देखनर्गिस-ए-अरज़क के शैदा दीदा-ए-आहू भी देखऐ सुनहरी ज़ुल्फ़ के क़ैदी सियह गेसू भी देखकर चुका सैर अस्ल मरकज़ पर तो आना चाहिएअपने घर की सम्त भी आँखें उठाना चाहिएपुख़्ता-कारी सीख ये आईन-ए-ख़ामी ता-कुजाजादा-ए-अफ़रंग पर यूँ तेज़-गामी ता-कुजासोच तू जी में ये झूटी नेक-नामी ता-कुजामग़रिबी तहज़ीब का तौक़-ए-ग़ुलामी ता-कुजामर्द अगर है ग़ैर की तक़लीद करना छोड़ देछोड़ दे लिल्लाह बिल-अक़सात मरना छोड़ दे
आता है याद मुझ को बचपन का वो ज़मानारहता था साथ मेरे ख़ुशियों का जब ख़ज़ानाहर रोज़ घर में मिलते उम्दा लज़ीज़ खानेबे-मेहनत-ओ-मशक़्क़त हासिल था आब-ओ-दानाबच्चों के साथ रहना ख़ुशियों के गीत गानादिल में न थी कुदूरत था सब से दोस्तानामेहंदी के पत्ते लाना और पीस कर लगानाफिर सुर्ख़ हाथ अपने हर एक को दिखानाआवाज़ डुगडुगी की जूँ ही सुनाई देतीउस की तरफ़ लपकना बच्चों का वालिहानाहर साल प्यारे अब्बू लाते थे एक बकराचारा उसे खिलाना मैदान में घुमानावो दूर जा चुका है आता नहीं पलट करबचपन का वो ज़माना लगता है इक फ़सानादादी को मैं ने इक दिन ये मशवरा दिया थाचेहरे की झुर्रियों को आसान है मिटानाचेहरे पे आप के हैं जो बे-शुमार शिकनेंआया मिरी समझ में उन से नजात पानाकपड़े की सारी शिकनें मिटती हैं इस्त्री सेआसान सा अमल है ये इस्त्री चलानाइक गर्म इस्त्री को चेहरे पे आप फेरेंउम्दा है मेरा नुस्ख़ा है शर्त आज़मानाइक रोज़ वालिदा से जा कर कहा किचन मेंअब छोड़िएगा अम्मी ये रोटियाँ पकानाइक पेड़ रोटियों का दालान में लगाएँउस पेड़ को कहेंगे रोटी का कारख़ानाशाख़ों से ताज़ा ताज़ा फिर रोटियाँ मिलेंगीतोड़ेंगे रोटियाँ हम खाएँगे घर में खानाकैसी अजीब बातें आती थीं मेरे लब परआज उन को कह रहा हूँ बातें हैं अहमक़ानावो प्यारी प्यारी बातें अब याद आ रही हैंबचपन का वो ज़माना क्या ख़्वाब था सुहाना
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